Book Title: Agam Sagar Kosh Part 03
Author(s): Deepratnasagar, Dipratnasagar
Publisher: Deepratnasagar

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Page 59
________________ [Type text] आगम-सागर-कोषः (भागः-३) [Type text] दशवै०११७ सामान्यप्रहणात्मको बोधः। प्रज्ञा० ४५३। दर्शनंदंतपुरं- दन्तपुरं द्रव्यव्युत्सर्गे नगरम्। आव० ७१७। आकारः। जीवा० २०७। दर्शनं सम्यग्दर्शनम्। आव. दन्तपुरं-योगसंग्रहे निरपलापदृष्टान्ते दन्तचक्रराज्ञो ५८० दशवै०१०१ओघ०९। दर्शनम्। आव०७९३। नगरम्। आव०६६६। णगरविसेसो। निशी. १२८ अ। दर्शनं-सामान्यविशेषात्मके वस्तुनि सामान्यावबोधः दंतचक्क-रायाए नगरं। व्यव० १०७ अ। दन्तपुरं- रूपसामान्यपरिच्छेदः। जीवा० १८ दर्शन-सम्यक्त्वम्। दन्तचक्रराज-धानी। उत्त० ३०१ स्था०६५। भग. ५१। दर्शनं-वर्णादिपरिणतसूत्रानुसारः। दंतमणि-दन्तमणिः-प्रधानदन्तः, हस्तिप्रभृतीनां दशवै० १७७। दर्शनं-प्रस्थातुर्दृष्टिपथः। जम्बू० २६२। दन्तजो वा मणिः। प्रश्न. १५३| दर्शनं-सामान्योपलब्धिरूपं दंतमाला-दन्तमालाः भरते द्रुमगणविशेषः। जं०प०९८१ चक्षुरचरक्षुरवधिकेवलाख्यम्। आचा० ६८ दर्शनप्रतिमा एकोरुकद्वीपे वृक्षविशेषः। जीवा० १४५ श्रावकस्य प्रथमा प्रतिज्ञा। आव०६४६। दर्शनं-रुचिरूप दंतवक्के-दान्ता-उपशान्ता यस्य वाक्येनैव शत्रवः स आत्मनः परिणामः। भग. ३५०| अनुभवनम्। भग. दान्तवाक्यः चक्रवर्ती। सूत्र० १५०| ७१० ईहावग्रहौ हि दर्शनं-सामान्यग्राहकत्वात् दंतवणं-दन्तवेदम्। ओघ० १७२। श्रद्धानम्। स्था० २३। दृश्यन्ते श्रद्धीयन्ते पदार्था दंतवाणिज्ज-दन्तवाणिज्यं अनेनास्मादस्मिन् वेति दर्शनं-दर्शनमो-हनीयस्य क्षयः हस्तिदन्तादिक्रयविक्रयक्रिया। आव० ८२९) क्षयोपशमो वा दृष्टिर्वा दर्शनं-दर्शनमोहनीदंतवेयणा-दन्तदेवना-दशनपीडा। भग० १९७५ यक्षयायाविर्भूतस्तत्त्वश्रद्धानरूप आत्मपरिणामः। दंतारा-शिल्पार्यभेदः। प्रज्ञा० ५६) स्था० २४। दृष्टिः-रूचिस्तत्त्वानि प्रति। स्था० ३०| दंतिक्कं- पुण्णो तंदुलोट्ठो। निशी. ३९ आ। तंद्ला, सव्वं शुद्धाशुद्ध-मिश्रपुजत्रयरूपंमिथ्यात्वमोहनीयम्। स्था० वा दंतखज्जयं। निशी० ३७ अ। मोदकादिकं दन्तखादयं १५१| अभिप्रायो यदि वा दृश्यते यथावस्थितं तन्दुलचूर्णो वा। मोदकमण्डकादिकं यद्बहुविधं वस्तुतत्त्वमनेनेति दर्शनं उपदेशः। आचा०१७२। दन्तखाद्यकं तद्दन्तिकम्। बृह० १२६ अ। तन्दुलचूर्णः। अभिप्रायः। आचा० २२७। दर्शनं-रूपम्। निर० ४। राज० बृह. १२९ । ११ दर्शनम्। स्था० ३३७ प्रमेयस्य परिच्छेदनम्। भग. दंतिक्कचूण्णं- तन्दुललोट्टः। बृह. १२९ अ। ६५९। दर्शनं क्षायिक-भावापन्नं सम्यक्त्वम्। जम्बू० दंतिलगं- दन्तुरः। आव० २११। १६|| सेवनम्। बृह. २०३ अ। दृश्यते दंतलिया-दन्तिलिका-स्कन्ददासी। आव २०१। तत्त्वमस्मिन्निति दर्शनम्। उत्त० ५५६। दृष्टिदर्शनंदंतो-साधारणबादरवनस्पतिकायविशेषः। प्रज्ञा० ३४। तत्त्वेष रुचिः। स्था० ४८१ दर्शनं-प्रकाशनं दंतक्खलिय- फलभोजी। औप. ९० भग० ४१९| उपनिबन्धनम्। सम० ११६ आकारः। जम्बू०५२। फलभोजिनः। निर०२५१ दंसणकसायकुसील-दर्शनमाश्रित्य कषायकुशीलो दंते-ददति। पिण्ड. १६२ दर्शनक-षायकुशीलः। भग० ८९०/ दंदिखंडो-दण्डीखण्डः। आव०४२६| दंसणपक्खो-दर्शनपक्षः-योऽप्रत्याख्यानकषायोदयवति दंशः- चतुरिन्द्रियजीवविशेषः। प्रज्ञा० २३। श्रावके भवति। आव० ५३३ दंष्ट्रा-आशी। प्रज्ञा० ४७। क्षुल्लहिमवदंष्ट्रा। जीवा० १४५५ | दंसणपरीसह-दर्शनं-सम्यग्दर्शनं, सहनं चास्य दंस-दर्शनं दर्शः। आव० ८२ पञ्चमः परीषहः। आव. क्रियादिवा-दिनां विचित्रमतश्रवणेऽपि निश्चलचित्ततया ६५६। धारणम्। सम० ४०। दर्शनपरीषहः-दर्शन-सम्यग्दर्शनं दंसणं-दर्शन-स्वस्वविषये सामान्यग्रहणं तदेव क्रियादिवादिना विचित्रमतश्रवणेऽपि सम्यक् रूपसामान्यग्रहण-लक्षणम्। प्रज्ञा० ५२७। दर्शनं-रूपम्। परिषह्यमाणं निश्चलचित्ततया धार्यमाणं परीषहः, ज्ञाता० ११। सामा-न्यविशेषात्मके वस्तुनि दर्शनं दर्शनव्यामोहहेतरैहिकामष्मिकफ मुनि दीपरत्नसागरजी रचित [59] "आगम-सागर-कोषः" [३]

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