Book Title: Agam Sagar Kosh Part 03
Author(s): Deepratnasagar, Dipratnasagar
Publisher: Deepratnasagar

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Page 98
________________ [Type text] आगम-सागर-कोषः (भागः-३) [Type text]] दर्शनचारित्रधनः साध्वादिः। आव० ४०७ धान्य-व्रीहि- चारित्ररूपः। जीवा० २५६। धर्मः पर्यायो गणो विशेषश्च। कोद्रवमूदगमाषतिलगोधूमयवादि। आव० ८२६। धन्यः। प्रज्ञा० १७९| धार्म्य-न्यायः। व्यव० २०१ अ। आव०६६७। धन्यः- भद्रासार्थवाह्याः पुत्रः। अनुत्त०३ धर्मास्तिकायः। सम०६। धर्मः-धर्मास्तिकायो धान्य-चतुर्विंशतिभेदम्। दशवै. १९३१ गत्युपष्टम्भगुणः। स्था०४०| धर्म लोकधर्मम्। ओघ. धन्यःधनावहत्वात्। ज्ञाता०७६) ७२| धर्मः-श्रुतचारित्रात्मकः दुर्गतिधन्नग-धान्यकं-कस्तम्भरी। दशवै. १९३। प्रपतज्जन्तुधारणस्वभावः। सम०४। धन्नदरा-धण्णवासणा। निशी० १४७ आ। श्रुतचरणधर्मादनपेतं धर्म्यम। स्था. १८८ धर्मःधन्नपुलागं- निष्पावावल्लादीनि धान्यानि। बृह. २११ प्रक्रमाद् गृहस्थधर्मः सम्यअ। ग्दृष्टयादिशिष्टाचारिताचारलक्षणः। उत्त० ३९१। धन्नासालिभद्दा- उपनालंदं वैभारेऽनशनिनौ। मरण। धर्मादनपेतं धन॑ एषणीयम्। उत्त०४२८१ धर्मः-विशेष धन्ना-सुरादेवगाथापतेर्भार्या। उपा० ३४॥ पादपोपगमन-रूपो मरणविशेषः। आचा. २९४| धर्मःधन्यक- शालिभद्रभगिनीपतिः। स्था० ४७४। धारयतीति दुर्गतौ प्रपततो जीवान् धारयतिसुगतौ वा धमण-धमन-महिष्यादीनां वायपूरणादि। प्रश्न. २२१ तान् स्थापयति इति धर्मः, श्रुतचारित्र-लक्षणः। स्था० ध्मानं महिष्यादीनां वायुपूरणम्। प्रश्न० ३८भस्त्रा २१। धर्मः-विषयाभि-लाषः। स्था० ५१६। धर्मः-समाचारो ध्मातः। आचा०७४। व्यवस्था। स्था० ५१५। धर्मः-जिनाज्ञारूपः, धमणि-धमनिः-नाडी। प्रश्न.1 चारित्रलक्षणः। स्था० २४१। धर्मः-चेतनाचेतन धमणिसंताए- धमनीसन्ततः-नाडीव्याप्तः। भग० १२६। द्रव्यस्वभावं श्रुतचारित्ररूपं वा। आचा० १५४। धर्मः ज्ञाता० ७६। धमनयः-शिरास्ताभिः सन्ततो व्याप्तो अविपरीतार्थम्। आचा० २५८१ धर्मः चारित्र-रूपः। दशवै. धमनि-सन्ततः। उत्त० ८४| २७१। दुर्गतौ प्रपतन्तमात्मानं धारयतीति धर्मः। दशवै. धमणी-धमनिः कोष्ठकहड्डान्तरम्। विपा० ४२१ १३। धर्मार्जनव्यापारपरः साधुर्धर्मपुरुषः। आव० २७७। धमधमंतो-धमधमायमानः। आव० १९६| धर्मः-श्रुतधर्मादिः। दशवै २४२। श्रुतचारित्रात्मकम्। धमनं- फूत्कारणम्। दशवै. १५४१ ज्ञाता०४६। जीवपर्यायः। ज्ञाता०६९। धर्म:धमाससारे-धमासासारः। प्रज्ञा० ३६० वस्तुस्वभावः आचारो वा। उत्त० १२८। धर्म्यधम्मंतेवासी-धर्मान्तेवासी-धर्मप्रतिबोधनतः शिष्यः, धर्म्यध्यानम्। आव० ५९० धर्मार्थितयोपसम्पन्नो वा। स्था० २४२। अन्ते-समीपे जिनप्रणीतभावश्रद्धानादिलक्षणं धर्म्यम्। आव० ५८२। वस्तुं शीलमस्येत्यन्तेवासी, धर्मार्थमन्तेवासी धर्म-सूत्रकृताङ्गाद्यश्रुतस्कंधे नवममध्ययनम्। आव. धर्मान्तेवासी शिष्यः-इत्यर्थः। स्था० ५१६) ६५१। दसविहसमणधम्मसमणगतं। दशवै० १४॥ धर्म:धम्म-धर्मः-दर्गतौ प्रयतन्तं सत्त्वसङ्घातं धारयतीति, पुण्यम्। बृह. १९८ अ। धर्मकारणं यत्तद्धर्मदनं धर्मे धर्मः पञ्चदशो जिनः, यस्मिन् गर्भगते सति जननी एव वा। स्था० ४९६। सूत्रकृताङ्गप्रथमश्रुतस्कन्धे नवमदानदयादिके-ष्वधिकारेषु जाती सुधम्र्मेति तेन मध्ययनम् सम० ३१। धर्मे-अस्तिकायधर्मे श्रुतधर्मादौ धर्मजिनः। आव० ५०४॥ धर्मः-लोल्पतया वा। प्रज्ञा० ५९। धर्मः-व्यवहारः। जम्बू१६७ धर्मःतद्विषयग्रहणस्वभावः। प्रश्न. १३८1 धर्मादनपेतः धर्मकथानयोगः। दशवै० ४। झाणे। भग० ९२३। धर्मःधर्म्यः-न धर्मातिक्रान्तः। उत्त० ६४। दुर्गतौ श्रुतधर्मश्चारित्रधर्मश्च। प्रज्ञा० ३९९। प्रपतन्तमात्मानं धारयतीति धर्मः। आव० १३४, २३६। | धम्मकहा-धर्मकथा व्याख्यानरूपा। उत्त० ५८५। धर्मस्यजीवस्य स्वभावः धर्मः। दशवै० १२६। धर्म: श्रुतस्वरूपस्य कथा-व्याख्या धर्मकथा। स्था० ३४९। लोकश्रुतिः। पिण्ड० १४५। धर्मः-श्रुतचारित्रलक्षणः। भग. धर्मस्य-अहिंसादिलक्षणधर्मस्य कथा धर्मकथा९०। धर्मः-श्रुतचारित्रात्मकः। उत्त० १७। धर्मः आख्यान-कानि। सम० ११९। धर्मकथा मुनि दीपरत्नसागरजी रचित [98] "आगम-सागर-कोषः" [३]

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