Book Title: Agam Sagar Kosh Part 01
Author(s): Deepratnasagar, Dipratnasagar
Publisher: Deepratnasagar
View full book text
________________
२२१
६३
[Type text] आगम-सागर-कोषः (भागः-१)
[Type text] स्था०४९
अन्नकाले- अन्नकालः, सूत्रार्थपौरुष्युत्तरकालं अनुयोगद्वाराणि- व्याख्याङ्गानि। आचा० ३।
भिक्षाकालः। सूत्र० ३०१। अनुलिखन्-अभिलङ्घयन्। जीवा० १७५
अन्नकिच्चकरो- अन्यतृप्तिकरः। आव० ७२० अनुलेपनेन- सकृल्लित्पस्य पुनः पुनरुपलेपनेन। सम० अन्नगिलाय- पर्युषितम्। आचा० ३१३। १३६
अन्नत्थ- अन्यत्र, परिवर्जनार्थे। प्रज्ञा. २५३। व्यव. १६४ अनुलोम-उत्सर्गः। ओघ०६५।
आ। अनुलोमवचनसहितत्वं-प्रतिरूपविनयविशेषः। व्यव० अन्नधम्मिय-अन्यधार्मिकः, मिथ्यादृष्टिः। ओघ २४
अन्नपर-अन्यपरं-अन्यरुपतया परमन्यत्। आचा० अनुल्बण-अनुटः। जीवा० २७५१
४१५ अनुपातनम्- उच्चारणम्। आव० ८३५)
अन्नपाणं-अन्नपानम्, ओदनकाम्जिकादि। उत्त. ३६३। अनृतम्-असत्यम्। स्था० ५००।
अन्नभयं- परचक्कभयं। निशी० २१ । अनेकजातिसंश्रयादविचित्रम्- वाण्यतिशयविशेषः। सम० | अन्नभावेणं- अन्यभावः-योऽसौ गन्ता सोऽन्यभावः,
उन्निष्क्र-मितुकामः। ओघ० २२॥ अनैकान्तिकः- हेतुदोषविशेषः। स्था० ४९३।
अन्नमन्नं-अन्योऽन्यं-परस्परं। स्था० १६२ अनुशयः- क्रोघः। उत्त० ३७७
अन्नमन्नओगाढाइं- एकक्षेत्राश्रितानि। भग० ७५८४ अनुश्रेणि- ऋजुश्रेणिः। उत्त० ५९७)
अन्नमन्नगढिया- अन्योऽन्यग्रथिता, परस्परगुम्फिता। अणुट्ठाणं- अनुष्ठानं-विहितम्। आव० ६१९।
भग. २१५१ अनुसारगतिः- अनुपातगतिः। सूर्य. १६।
अन्नमन्नगुरुयत्ता- अन्योऽन्यगुरुकता, अन्योऽन्येन अन्नं-अन्यत्। उत्त० १३७
ग्रन्थनाद्गुरुकता-विस्तीर्णता। भग० २१५) मण्डकखण्डखाद्यादिसमस्तमपि भोजनम्। उत्त. अन्नमन्नगुरुयसंभारियत्ता३६९।
अन्योऽन्यगुरुकसम्भारिकता, अन्योऽन्येन गुरुकं अन्नंति-अनयन्ति, आगच्छन्ति। ओघ. १२६)
यत्सम्भारिकं तद्भावस्तत्ता। भग० २१५ अन्नंदाई-असूया, अन्यामिदानी वा। आव० ५०९। अन्नमन्नघडत्ताए- परस्परसमुदायता। भग०७५८। अन्न-अन्यः। भग० ३१७। अन्न-भतः। दशवै० २१६। अन्नमन्नपुट्ठाई-आगाढश्लेषतः। भग०७५८। अन्नइलाय-अन्नतिलाए, दोषान्नभोजी। प्रश्न. १०६। अन्नमन्नबद्धाइं- गाढाश्लेषतः। भग० ७५८१ अन्नइलायए- अन्नं विना ग्लानो भवति। भग० ७०५। अन्नमन्नभारित्ता- अन्योऽन्यभारिकता, अन्योऽन्यस्य अन्नइलायचरए-अन्नग्लानको दोषान्नभूगिति, अथवा यो भारः स विद्यते यत्र तदन्योऽन्भारिकं अन्नं विना ग्लायकः-समुत्पन्नवेदनादिकारण एव, तद्भावस्तत्ता। भग० २१५ अन्यस्मै वा ग्लायकाय भोजनार्थं चरतीति
अन्नयरंसत्थं- अन्यतरत् शस्त्रम्। सर्वशस्त्रम्, अन्नग्लानकचरकोऽन्नग्लाय
एकधारादिश-स्त्रव्यवच्छेदेन सर्वतोधारशस्त्रकल्पम्। कचरकोऽन्यग्लायकचरको वा। स्था० २९८।
दशवै. २०११ अन्नउत्थिए-अन्यतीर्थिकः, चरकपरिव्राजकभिक्षुभौता- | अन्नयर-अन्यतरम्, स्तोकम् दशवै. १९८१ प्रतिकूलम्। दिकः। आव०८११।
आचा० ३४२॥ अन्नउत्थिता-अन्ययूथिकाः-अन्यतीर्थिकाः। स्था० अन्नयरायम्मि-अन्यतरस्मिन्। उत्त. ५४३। १३५
अन्न भण-अन्येनाकृष्यमाणः। ओघ० १६५। अन्नउत्थिय-अन्ययूथिकः, अन्यतीर्थिकः, चरकादिकः। | अन्नलिंगे- अन्यलिङ्गम् साधुलिङ्गम्। आव० १३४। जीवा०१४३।
| अन्नवत्थुवन्नास-अन्यवस्तूपन्यासः, उपन्यासस्य
मुनि दीपरत्नसागरजी रचित
[66]
“आगम-सागर-कोषः" [१]

Page Navigation
1 ... 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 183 184 185 186 187 188 189 190 191 192 193 194 195 196 197 198 199 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224 225 226 227 228 229 230 231 232 233 234 235 236 237 238