Book Title: Ratnastok Mnjusha
Author(s): Dharmchand Jain
Publisher: Samyaggyan Pracharak Mandal

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Page 37
________________ बोल लं 4. अठाणु बोल का बासठिया (महादण्डक) प्रज्ञापना सूत्र पद 3 में 98 बोल की अल्पबहुत्व का वर्णन है। वह बासठिया युक्त इस प्रकार है जीव. गुण. योग. उप. ले. 1. सबसे थोड़े गर्भज मनुष्य 2 14 15 12 6 2. इनसे मनुष्यिनी संख्यात गुणी 2 14 13 12 6 बादर तेउकाय पर्याप्त असंख्यात गुण 1 1 1 3 3 पाँच अनुत्तर विमान के देव असंख्यात गुण 2 1 11 6 1 ग्रैवेयक की ऊपर की त्रिक के देव संख्यात गुण 2 48 119 1 6. मध्यम त्रिक के देव संख्यात गुण 2 4 11 9 1 7. नीचे की त्रिक के देव सं. गुण 4 119 1 8. बारहवें देवलोक के देव सं. गुण 2 4 11 9 1 9. ग्यारहवें देवलोक के देव सं. गुण 2 4 11 9 1 10. दसवें देवलोक के देव सं. गुण । 4 119 1 11. नौवें देवलोक के देव सं. गुण 2 4 11 9 1 12. सातवीं नरक के नेरइये असं. गुण 2 4 11 9 1 13. छठी नरक के नेरइये असं. गुण 2 4 11 9 1 8. भगवती सूत्र शतक 13 उद्देशक 2 तथा शतक 24 उद्देशक 21 में तथा जीवाभिगम की चतुर्विधा नामक तृतीय प्रतिपत्ति के दूसरे वैमानिकोद्देशक में ग्रैवेयक तक तीनों दृष्टि बताई है। कर्म ग्रन्थ भाग 3 गाथा 11 में ग्रैवेयक में गुणस्थान पहले से चौथे तक बताया है अर्थात् मिश्रदृष्टि मानी है। 32

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