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दादागुरु देव पूजा संग्रह कुशल कीरति मुनिराजकी, कुशल कीर्ति विस्तार । जब छाई जग में यहां, जन बोले जयकार ।। हो गुरुराज श्रीजि शासन भासन कारी सुखकार ॥
हो गुरुराज० ॥१॥ नरपति बोधक सदगुरु, गणपति श्रीजिनचन्द्र । आयु शेष निज जानते. आतम-ध्यान-अमंद ।। हो गुरुराज निजपद योग्य कुशल को देख अविकार
हो गुरुराज० ॥ २ ॥ श्री राजेन्द्राचार्य को, दें गुरु आज्ञा लेख । कशल कशल पद योग्य है, यामें मीन न मेख ॥ हो गुरुराज जग उपकारी जानी महिमा हितकार॥
हो गुरुराज० ॥३॥ आराधक गुरुदेव के, श्रमणोपासक वीर । विजयसिंह को दें गुरु, लेखाज्ञा तदबीर ।। हो गुरुराज पुण्य प्रकाश विराजित देवें बोधसार ।।
हो गुरुराज० ॥ ४ ॥ संघ चतुर्विध साथ में, करते धर्मप्रचार । कोसाणा में श्रीगुरु, पहुँचे स्वर्ग मझार ॥ हो गुरुराज श्रीजिनचन्द्र विरह में छाया अन्धकार॥
हो गुरुराज० ॥ ५ ॥
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