Book Title: Vardhaman Jivan kosha Part 2
Author(s): Mohanlal Banthia, Shreechand Choradiya
Publisher: Jain Darshan Prakashan

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Page 326
________________ वर्धमान जीवन - कोश २७६ विशिष्टाऽन्योऽन्यानुवेधेन सर्वधर्माणां धर्मिणा व्याप्तत्वात् अभेदोऽप्यस्ति, अन्यथा तस्य धर्मा इति संबंधानुपपत्तिः, ततश्च न सर्वेषां वीतरागत्वप्रसंगः, केवलभेदस्यानभ्युपगमात्, नापि दोषक्षये तदात्मनोऽपि क्षयः, केवलाभेदस्यानभ्युपगमादिति न काचित् क्षतिः । टीका - व्याख्या पूर्ववत् छिन्नंमि संसयंमी जाइजरामरणविप्प मुक्कणं । सो समणो पव्वतो तिहिं उ सह खंडियसएहिं । ६४१| - आव० निगा ६३८ से ६४१ प्रभुमागात् प्रभासोऽपि तमूचे भगवानपि । निर्वाणमन्ति नो वेति प्रभास ! तव संशयः ॥ १५६ ॥ ॥ मा संशयिष्ठा निर्वाणं मोक्षः कर्मक्षयः स तु । वेदान् सिद्धं कर्म जीवाऽवस्था वैचित्र्यतोऽपि च । १५७ | क्षीयते कर्म शुद्धैस्तु ज्ञानचारित्रदर्शनैः । प्रत्यक्षोऽतिशयज्ञानभाजां मोक्षस्तदस्ति भोः १ ॥ १५८ ॥ प्रतिबुद्धः प्रभासोऽपि स्वाम्युपन्यस्तया गिरा । दीक्षामादन्त सहितः खंडिकानां त्रिभिः शतैः ॥१५६॥ महाकुलाः महाप्राज्ञाः संविग्नाः विश्ववंदिताः । एकादशाऽपि तेऽभूवन्मूलशिष्याजगद्गुरोः ॥ १६० ॥ त्रिशलाका पर्व १८ / सर्ग ५ इसके पश्चात् प्रभास भगवान् के पास आया। उसे देखकर भगवान् बोले- हे प्रभास ! मोक्ष है या नहीं ? ऐसा तुमको सन्देह है । 7 परन्तु इसके विषय में तुम्हें किंचित् भी सन्देह नहीं करना चाहिए । कर्म का क्षय रूप मोक्ष - अवश्यमेव है । वेद तथा जोव की अवस्था की विचित्रता से ही कर्म सिद्ध होता है। शुद्ध ज्ञान, दर्शन और चारित्र से कर्म का • क्षय होता है। इस कारण अतिशय ज्ञानधारी पुरुष को मोक्ष प्रत्यक्ष भी होता है । इस प्रकार भगवान् के वचनों से प्रणाम प्रतिबोध को प्राप्त हुआ । फलस्वरूप ३०० पास दीक्षा ग्रहण की। इस प्रकार महान् कुल में उत्पन्न हुए, महान् प्राज्ञ संवेग को प्राप्त और विश्ववंदित - ऐसे ग्यारह प्रसिद्ध विद्वान् श्री वीर प्रभु के मूल शिष्य हुए । .. प्रभास गणधर के माता-पिता का नाम (क) अइभद्दाए बलम्स य पुत्तो चालीसवरिसाओ जाओ । रायगिहे उप्पण्णी एक्कारसमो पभाति ॥ इय दिय-वसुप्पण्णा समत्थ (त) सत्थत्थ पारगा सव्वे । चरम- शरीरा मोक्खं विमल-गुणगहरा दिंतु धर्मो० ० पृ० २२७ पुत्रोऽभूदतिभद्रोदरोद्भवः ॥५६॥ त्रिशलाका० पर्व १० / सर्ग ५ (ख) तथा पुरे राजगृहे बलनाम्नो द्विजन्मनः । प्रभासो नाम शिष्यों के साथ भगवान् के प्रभाम गणधर के पिता का नाम बल और माता का नाम अतिभद्र था। जन्म स्थान राजगृह था । चालीस वर्ष को आयु थी । चरम शरीरी थे व मोक्ष स्थान को प्राप्त किया । • ३ प्रभास गणधर का परिवार ( गणधर के साथ दीक्षित ) दुहंतु जुअलयाणं तिसओ तिसओ हवइ गच्छो Jain Education International For Private & Personal Use Only -आ० निगा ५६७ www.jainelibrary.org

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