Book Title: Vardhaman Jivan kosha Part 2
Author(s): Mohanlal Banthia, Shreechand Choradiya
Publisher: Jain Darshan Prakashan

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Page 341
________________ ०६४ वर्धमान जीवन कोश क्या उन्हें धर्म-उपदेश देना चाहिए ? . . हाँ? देना चाहिए। क्या वे दीक्षित-धर्म में उपस्थित किये जा सकते हैं ? हाँ ! किये जा सकते हैं। क्या वे तथा प्रकार [ व्यक्ति , संभोग-साधु भों की पारस्परिक व्यवहार क्रिया के योग्य हैं। हाँ ! योग्य है। उनमें से कोई दीक्षा छोड़कर पुनः गृहस्थ बन जाते हैं क्या ? हाँ ! बन सकते हैं। तो वे तथा प्रकार [ व्यक्ति ] संभोग के योग्य रहते हैं ? नहीं ! ऐसा नहीं हो सकता है । वह वही जीव है जो पहले संभोग के योग्य नहीं थे। 'फर बाद में संभोग के योग्य थे और अब संभोग के योग्य नहीं रहे। क्योंकि पहले वे अश्रमण थे. फिर श्रमण बने और अब अश्रमण है। अश्रमण के साथ श्रमण का संभोग नहीं हो सकना-यह समझिये और निर्ग्रन्थ । यही समझना योग्य है। [ इन उदाहरणों के समान ही त्रस स्थावर जीवों के बारे में समझिये । ] .१० प्रत्याख्यान-विषय-उपदर्शन(क) भगवं च णं उदाहु-णियंठा खलु पुच्छियव्वा-आउसंतो ! णियंठा ! इह खलु संतगइया समणोवासगा भवंति। तेसिंच णं एवं दुत्तपुव्वं भवइ - णो खलु वयं संचाएमो मुंडाभवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइत्तए, वयं णं चाउद्दसट्टमुहिठ्ठपुण्णमासिणीसु पडिपुण्णं पोसह सम्म अणुपालेमाणा विहरिस्सामो। 'थूलग पाणाइवायं पक्वाइस्सामो, एवं थूलगं मुमावायं थूलगं अदिण्णादाण थूलगं मेहुणं थूलगं परिग्गरं पचखाइरसामो, इच्छापन्मिाणं करिसामो दुविहं तिविहेणं । मा खलु ममट्ठाए किंचि वि करेह वा काग्वेह बा तत्थ वि पञ्चकवाइस्सामो। ते णं अभंचा अपिच्चा असिणाइत्ता आसंदीपेढियाओ पच्चोरहित्ता ते तह कालगया किं वत्तव्वं सिया। सम्म कालगय त्ति वत्तव्यं सिया । ते पाणा वि वुच्चंति, ते तसावि वुरचंति. ते महाकाया, ते चिरट्टिइया। ते बहुतग्गा पाणाजेहिं समणोवासगस्स सुपच्चक्खायं भवइ। ते अप्पयरगा पाणा जेहिं समणोवासगस्स अपच्चक्खायं भवइ। से महया तसकायाओ उवसंतस्स उवट्टियस्स पडिविरयस्स नं णं तुम्भे वा अण्णो वा एयंवयह-"णत्थिणं से केइ परियाए जंसि समणोवासगस्स एगपाणाए वि दंडे णिक्खित्ते।" अयंपि 'भे उवएसे' णो णेयाउए भवइ । -सूय० श्रु२/अ/सू २० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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