________________ 26 जैनदर्शन में द्रव्य, गुण और पर्याय की अवधारणा दिया था। वे सोमिल नामक ब्राह्मण को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहते हैं- "हे सोमिल ! द्रव्यदृष्टि से मैं एक हूँ, ज्ञान और दर्शन रूप दो पर्यायों की प्रधानता से मैं दो हूँ। कभी न्यूनाधिक नहीं होनेवाले आत्म-प्रदेशों की दृष्टि से मैं अक्षय हूँ, अव्यय हूँ, अवस्थित हूँ। तीनों कालों में बदलते रहने वाले उपयोग स्वभाव की दृष्टि से मैं अनेक हूँ।" ___ इस प्रकार भगवान् महावीर जहाँ एक ओर द्रव्यदृष्टि (Substantianl view) से आत्मा के एकत्व का प्रतिपादन करते हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यायार्थिक दृष्टि से एक ही जीवात्मा में चेतन पर्यायों के प्रवाह के रूप से अनेक व्यक्तित्वों की संकल्पना को भी स्वीकार कर शंकर केअद्वैतवाद और बौद्ध के क्षणिक आत्मवाद की खाई को पाटने की कोशिश करते हैं। जैन विचारक आत्माओं में गुणात्मक अन्तर नहीं मानते हैं। लेकिन विचार की दिशा में केवल सामान्यदृष्टि से काम नहीं चलता, विशेषदृष्टि का भी अपना स्थान है। सामान्य और विशेष के रूप में विचार की दो दृष्टिया हैं और दोनों का अपना महत्त्व है। महासागर की जल-राशि सामान्यदृष्टि से एक है, लेकिन विशेषदृष्टि से वही जल-राशि अनेक जलबिन्दुओं का समूह प्रतीत होती है। यही बात आत्मा के विषय में भी है। चेतन-पर्यायों की विशेषदृष्टि से आत्माएँ अनेक हैं और चेतना द्रव्य की दृष्टि से आत्मा एक भी है। अपनी परिवर्तनशील चैतसिक अवस्थाओं के आधार पर हम स्वयं भी एक स्थिर इकाई न होकर प्रवाहशील इकाई हैं। जैनदर्शन यह मानता है कि आत्मा का चरित्र या व्यक्तित्व परिवर्तनशील है, वह देशकालगत परिस्थितयों में बदलता रहता है, फिर भी वही रहता है। हमारे व्यक्तित्व बनते और बिगड़ते रहते हैं फिर भी वे हमारे ही अंग हैं; इस आधार पर हम उनके लिए उत्तरदायी बने रहते हैं। इस प्रकार जैनदर्शन अभेद में भेद, एकत्व में अनेकत्व की धारणा को स्थान देकर धर्म और नैतिकता केलिए ठोस आधार प्रस्तुत करता है। जैनदर्शन जिन्हें जीव की पर्याय अवस्थाओं की धारा कहता है, बौद्धदर्शन उसे चित्त-प्रवाह कहता है। जिस प्रकार जैनदर्शन में प्रत्येक जीव अलग है, उसी प्रकार बौद्धदर्शन में प्रत्येक चित्तप्रवाह अलग है। जैसे बौद्धदर्शन के विज्ञानवाद में आलयविज्ञान है, वैसे जैनदर्शन में आत्म-द्रव्य है; यद्यपि हमें इन सब में रहे हुए तात्त्विक अन्तर को विस्मृत नहीं करना चाहिए / आत्मा के भेद: जैनदर्शन अनेक आत्माओं की सत्ता को स्वीकार करता है। इतना ही नहीं, वह प्रत्येक आत्मा की विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर उसकेभी भेद करता है। जैन आगमों में विभिन्न पक्षों की अपेक्षा से आत्मा के आठ भेद किए गये हैं 1. 2. भगवतीसूत्र, 1/8/10 भगवतीसूत्र 12/10/467