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सन्मति -विद्या-प्रकाशमाला
उसका त्याग राग-द्वेषादिका तथा अन्तर्जन्परूप - विकल्पका होता है, जो आत्मस्वरूपको मलिन क्रिये रहते हैं, और ग्रहण अपने शुद्धचिदानन्द-स्वरूपका होता है । परन्तु जो इन दोनों अवस्थाओंको-हिरात्म तथा अन्तरात्म- दशा
को-पार करके निष्ठितात्मा बन गया है – स्वात्मस्थित अथवा आत्मनिरत कृतकृत्य हो गया है— उसके लिये फिर वाह्य तथा आभ्यन्तर किसी भी प्रकारके त्याग - ग्रहणकी - कोई बात नहीं बनती अथवा नहीं रहती ।
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अहंकार-भवितव्यताके त्याग - ग्रहणकी प्रेरणा भवितव्यतां भगवती - १ मधियन्तु र रहन्त्वहं करोमीति । यदि सद्गुरूपदेश
व्यवसित- जिनशासनरहस्याः ॥ ६६ ॥
'यदि सद्गुरुके उपदेशसे' जिनशासन के रहस्यको आपने ठीक निश्चित किया है- समझा है - तो 'मैं करता हूँ' इस अहंकारपूर्ण कर्तृत्वकी भावनाको छोड़ो और भगवती भवितव्यताका आश्रय ग्रहण करो ।'
व्याख्या—यहाँ 'रहन्त्वहं करोमीति' वाक्य खास तौर से ध्यानमें लेने योग्य है । इसमें 'मैं करता हूँ' इस अहंकार
१ माहात्म्यवतीम् । २ श्राश्रयन्तु । ३२ त्यजन्तु ।.
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