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(१४२) दीपता रे जि०, गुणपर्याय प्रयोग ॥ मो० ॥ परित्त जेहनी वाचना रे जिप, संख्याता अनुयोग ॥ मो० ॥४॥ वेष्ट सि लोक निजुत्तसुं रे जि०, संग्रहणी पमिचित्त ॥ मो० ॥ ए सदु संख्यातां जिहां रे जि०, सुणतां उससे चित्त । मो० ॥ ५॥ सुय खंध इक राजतोरे जिप, दश अध्ययन उदार ॥ मो० ॥ उद्देशादिक वीस जै रे जि०, पद बहुत्तर हजार ॥ मो० ॥६॥ रागी जिनशासन तणो रे जि०, सुणे सिद्धांत वखाण ॥मो० ॥ विनयचंज कहैते हुवे रे जि०, परमारथरा जाण ॥ मो॥७॥ इति श्री ग० सं० ॥
॥ अथ ४॥ समवायांगसूत्र सझाय ॥ ॥ ढाल ॥ थारा महिलां ऊपर मेह रोखे वीजली ॥ एचाल । चोथो समवायांग सुणो श्रोता गुणी, हो लाल सुणो श्रो, पन्नवणा उपांग करी सोजावणी, हो लाल करी सो० ॥ अरध मागधी जाषा साखा सुरतणी, हो लाख साखा सु०, समकित नाव कुसुम परिमल व्यापी घणी, हो लाल परि॥१॥जीव अजीवने जीवाजीव समासथी, हो लाल जी०, लहीये एहथि जाव विरोध कांइ नथी, हो लाल वि०॥ नांगा तीन स्वसमयादिकना जाणीये, हो लाल यादि०, लोक अलोक ने लोकालोक वखाणीये, हो लाल लो ॥२॥ एकथकी चै सत समवाय परूपणा, हो लाल सम, कोमाकोमि प्रमाणक जीव निरूपणा, हो लाल जी० ॥ वारस विह गणी पिकटतणी संख्या कही, हो लाल त०, सासता अरथ अनंत कि बै एहना सही, हो लाल जै० ॥३॥ सुयखंध अध्ययन उद्देसादिके जला, हो
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