Book Title: Jain Shiloka Sangraha Pustika
Author(s): Nana Dadaji Gund
Publisher: Nana Dadaji Gund
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मोरचे गया ॥ ५७ ॥ रण संग्राम रोप्यो ना इ, केवी थाय ने जुवो लमाइ ॥ मानीतीकेरी तरफ मनज चमीया, ततक्षण प्रावी मोरचे अ डीया ॥५८॥विवेक विचार जना नाइ, श्रा तमारामें कीधी चडाइ॥चमी मोरचा आगल श्रावे. तोफो नाला ने बंदुका लावे ॥ ५९ ॥ म न महा बलीयो जोधो कहेवाय, जेहनो ताप तो नवि सहेवाय ॥ मन राजायें तोफ हलावी, आ तमाराम नपर चलावी ॥५०॥ बटे गोलाने न डका थाय, कायर केरा तो ठरे नहीं पाय ॥ ना लां बरगने कबाण तीर, जालवी ले ने श्रातमा वीर ॥६१ ॥खड खंजरना घाव करे , आत माराम पटे रमे ॥ घोब खपुवाने कटारा घाव, श्रातमाराम जालवे दाव ॥ ६२॥ पालेरो जइ प्रागेरो आवे, अातमा नपर घाव चलावे ॥न वागे तीर न वागे गोली, फिरीथी श्राव्यो बर बीज तोली ॥६३॥ नहीं मूकं हिवे एम वदेठे, प्रातमाराम खडखड हसे॥ थाक्यो मनराजा घावज करी, पागे गयो तिहां मोरचे फरी॥ ॥६४ ॥ करे विचार हिवे केम थासे, आत्तमा

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