Book Title: Jain Chalisa Sangraha
Author(s): ZZZ Unknown
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 57
________________ धरा जब यौवन जिनराई, राजुल के संग हुई सगाई । नाग को चली बरात, छप्पन कोटि यादव साथ । सुना वहाँ पशुओं का क्रन्दन, तोडा मोर मुकुट और कंगन । बाडा खौल दिया पशुओं का, धारा वेष दिगम्बर मुनि का । कितना अदभुत संयम मन में, ज्ञानीजन अनुभव को मन 1 नौ-नौ आँसू राजुल रोवे, बारम्बार मूर्छित होवे । फेंक दिया दुल्हन श्रृंगार, रो... रो कर यों करें पुकार । नौ भव की तोडी क्यों प्रीत, कैसी है ये धर्म की रीत । नेमि दें उपदेश त्याग का, उमडा सागर वैराग्य का । राजुल ने भी ले ली दीक्षा, हुई संयम उतीर्ण परीक्षा ।। दो दिन रहकर के निराहार, तीसरे दिन स्वामी करे विहार । वरदत महीपति दे आहार, पंचाश्चर्य हुए सुखकार । रहे मौन से छप्पन दिन तक, तपते रहे कठिनतम तप व्रत । प्रतिपदा आश्विन उजियारी, हुए केवली प्रभु अविकारी | समोशरण की रचना करते, सुरगण ज्ञान की पूजा कर I भवि जीवों के पुण्य प्रभाव से, दिव्य ध्वनि खिरती सद्भाव से । जो भी होता है अतमज्ञ, वो ही होता है सर्वज्ञ । ज्ञानी निज आत्म को निहारे, अज्ञानी पर्याय संवारे । अदभुत वैरागी दृष्टि, स्वाश्रित हो तजते सब सृष्टि । जैन धर्मं तो धर्म सभी का, है निजधर्म ये प्राणीमात्र का। 1 जो भी पहचाने जिनदेव, वो ही जाने आत्म देव । रागादि कै उन्मुलन को पूजें सब जिनदेवचरण को । देश विदेश में हुआ विहार, गए अन्त में गढ़ गिरनार । सब कर्मों का करके नाश, प्रभु ने पाया पद अविनाश । आते, उनको मन वांछित मिलजाते । ज्ञानार्जन करके शास्त्रों से, लोकार्पण करती श्रद्धा से । हम बस ये ही वर चाहे, निज आतम दर्शन हो जाए । 57

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