Book Title: Dharm ke Dash Lakshan Author(s): Hukamchand Bharilla Publisher: Todarmal Granthamala Jaipur View full book textPage 1
________________ कुछ सम्भतियों के अंश दणधर्मो पर इनना सुन्दर प्राधुनिक दृग का विवेचन इसमे पहिले मेरी दृष्टि में नहीं आया. इसमें एक बड़े प्रभाव की पुति हुई है । - पं० कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्ताचार्य. वाराणसी डा० माहव ने साहित्य के क्षेत्र में इस पुस्तक पर मचमुच डॉक्टरी का प्रयोग किया हे । दशधर्मो की ओषधि का प्रयोग, दश विकारों की बीमारी का पूरा आपरेशन कर, बहुत सुन्दरता में किया है । पं० जगन्मोहनलालजी जैन शास्त्रो. कटनो - स्वाध्याय प्रेमियां का इमका स्वाध्याय करना चाहिये | इसमें उन्हें धर्म के स्वरूप को समझने में पर्याप्त महायता मिलेगी । - पं० फूलचन्द्र जो सिद्धान्ताचार्य, वाराणसी जैन शास्त्रों के व्याख्याना. दार्शनिक विचारक डा. हुकमचन्द्र भारिल्ल द्वारा लिखी गयी यह पुस्तक पटनीय, मननीय एव धारण करने लायक है । राजस्थान पत्रिका ( ३ दिसम्बर, १६७८ } यह एक ऐसी अनुपम कृति है, जिसका स्वाध्याय करके प्रत्येक व्यक्ति महज ही श्रान्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा पाना है । वीर, मेरठ (१ जनवरी, १६७६ } - दृष्टान्न द्वारा तन्व कां समझा: उनको अपनी विशेषता है जो इस पुस्तक मे 'सर्वत्र देखी जानी है । वीरवारणी, जयपुर (३ दिसम्बर, १९७८ ) डॉ० भारिल्ल धर्म के स्वरूप को बडी सूक्ष्मदृष्टि और तकं की कसौटी पर कसवर मननीय बना देते है. माथ मे रोचकना भी बनी रहती है । सन्मति सन्देश. दिल्ली ( जनवरी, १६७६ ) - - -Page Navigation
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