Book Title: Pardeshi Rajano Ras
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 56
________________ (५५) करी नवि जाणे, दश गणा बद्मस्थ प्रमाणे ॥ हां० ॥ए॥ धर्मास्तिकाय अधर्म आकाशें, ए त्रणे अस्ति काय प्रकाशे ॥ हांग॥१०॥ जीव शरीर रहीत पर माणु, शब्द गंध वली वाय वखाणु ॥ हां ॥११॥ नवमें ए जिन केवली थासे, दशमें एतले नवि सिव जासे ॥ हां ॥१२॥ अथवा नहीं थासे दश गणा, नवी जाणे बद्मस्थ अयाणा ॥हां ॥ १३॥ एहिज बोल दशे सुप्रमाणे, सघले नाव करीने जाणे॥हांग ॥१४॥उपना ज्ञानने दरशन धारक, अरिहा जिनवर केवली साधक ॥ हां० ॥ १५॥ धर्मास्तिकाय प्रमुख दश जाणो, परदेशी हवे मनमां श्राणो ॥ हां ॥ ॥ १६ ॥ सदहो जीवनें काया जूआ, एटले प्रसन उ त्तर नव दृथा ॥ हां ॥१७॥ ढाल थए त्रीशप्र माणे, सूत्र वचन ज्ञानचंद वखाणे ॥ हांग ॥ १७ ॥ ॥दोहा॥ ॥ केशी श्रमण प्रत्ये कहे, हवे परदेशी राय ॥ हाथीने कुंथु तणो, जीवसरिखो थाय ॥१॥हंताप रदेशी सही, कहे केशी गुरु राय ॥ हाथीने कुंथु त णो, जीव सरिखो थाय ॥२॥ तो वलतुं राजा कहे, हाथी हुंती खामी॥श्रल्प कर्म हुवे कुंथुङ, किरिया Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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