Book Title: Anandghanji tatha Chidanandji Virachit Bahotterio
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 111
________________ ए चिदानंदजी कृत पद. ॥पू॥ए आंकणी॥ दीनानाथ दयाल दयानिधि,उर्लन अधिक बताया रे॥ दश दृष्टांतें दोहिला नरनव, उत्तरा ध्ययनें गाया रे॥पू॥१॥अवसर पाय विषय रस राच त,तेतो मूढ कहाया रे॥काग नमावण काज विप्र जि म,मार मणि पडताया रे ॥पू॥२॥ नदी घोल पाखान न्याय कर,अवाट तो आया रे॥ अई सुगम आगल रंही तिनकू, जिन कबु मोह घटाया रे ॥पू०॥३॥ चेतन चार गतिमें निश्चे,मोछार ए काया रे॥करत का मना सुर पण याकी, जिनकू अनर्गल माया रे॥पून ॥५॥ रोहण गिरि जिम रतनखाण तिम, गुण सदु यामें समाया रे ॥ महिमा मुखथी वरणत जाकी ,सुरं पति मन शंकाया रे॥पू० ॥ ५ ॥ कल्पवृद सम सं यम केरी,अति शीतल जिहां गया रे ॥ चरण करण गुण धरण महामुनि,मधुकर मन लोनाया रे॥पू॥६॥ या तन विण तिहुँ काल कहो किन, साचा सुख निप जाया रे ॥ अवसर पाय न चूक चिदानंद, सतगुरु यूं दरसाया रे॥ ॥ ७ ॥ इति पदं ॥ ॥ पद सित्तेरसुं ॥ पयूषण स्तुति ॥ ॥मणि रचित सिंहासन, बेठा जगदाधार ॥ पयूष ण केरो, महिमा अगम अपार ।। निजमुखथी दाखी, Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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