Book Title: Agam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Shwetambar
Author(s): Purnachandrasagar
Publisher: Jainanand Pustakalay

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Page 43
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir | आयारगोयर माइक्खंति, नाणभट्टा दंसणलूसिणो । १८७। नममाणा वेगे जीवियं विष्परिणामंति, पुट्ठावेगे जीवियस्सेव कारणा, | निक्खतंपि तेसिं दुन्निक्खतं भवइ, बालवयणिज्जा हु ते नरा पुणो पुणो जाई पकप्पिंति, अहे संभवंता विद्यायमाणा अहमंसीति विउक्कसे उदासीणे फरुसं वयंति, पलियं पक (प्र० गं ) थे अदुवा पकथे अतहेहिं, तं वा मेहावी जाणिज्जा धम्मं । १८८ । अहम्मट्ठी तुमंसि नाम बाले आरंभट्टी अणुवयमाणे हण पाणे घायमाणे हणओ यावि समणुजाणमाणे, घोरे धम्मे, उदीरिए उवेहइ णं अणाणाए, एस विसन्ने | वियद्दे वियाहिएत्तिबेमि (१८९। किमणेण भो, जणेण करिस्सामित्ति मन्त्रमाणे, एवं एगे वइत्ता मायरं पियरं हिच्चा नायओ य परिग्गहं वीरायमाणा समुट्ठाए अविहिंसा सुव्वया दंता (समणा भविस्सामो अणगारा अकिंचणा अपुत्ता अपसुया अविहिंसगा सुव्वया दंता परदत्त भोइणो पावं कम्मं न करेस्सामो समुट्ठाए पा० ) पस्स दीणे उप्पइए पडिवयमाणे, वसट्टा कायरा जणा लूसगा भवंति, अहमेगेसिं सिलोए पावए भवइ, से समणो भवित्ता विब्भंते २ पासहेगे समन्नागएहिं सह असमन्नागए नममाणेहिं अनममाणे विरएहिं अविरए दविएहिं अदविए, अभिसभिच्चा पंडिए मेहावी निट्टियट्टे वीरे आगमेणं सया परक्कमिज्जासित्तिबेमि । १९० ॥ अ० ६ ३० ४ ॥ सेगिसु वा गिहंतरेसु वा गामेसु वा गामंतरेसु वा नगरेसु वा नगरंतरेसु वा जणवयेसु वा जणवयंतरेसु वा गामनयरंतरे वा गामजणवयंतरे वा नगर जणवयंतरे वा संतेगइया जणा लूसगा भवंति अदुवा फासा फुसति ते फासे पुढे वीरो अहियासए, ओए समियदंसणे, दयं लोगस्स जाणित्ता पाईणं पडीणं दाहिणं उदीणं आइक्खे, विभा किट्टे वेयवी जे खलु समणे बहुस्सुए बज्झागमे। ॥ श्रीआचाराङ्ग सूत्रं ॥ ३२ पू. सागरजी म. संशोधित For Private And Personal Use Only

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