Book Title: Visheshavashyak Bhashyam Uttararddh
Author(s): Jinbhadra Gani Kshamashraman
Publisher: Rushabhdev Keshrimal Shwetambar Samstha

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Page 401
________________ विशेषाव कोट्याचार्य वृत्तौ ॥८९३॥ मुत्तादिभावओ णोवलद्धिमन्तिदियाई कुंभोव्व । उवलंभद्दाराणि उ ताइं जीवो तदुवलद्धा ||३८६४॥ तदुबरमेऽवि सरणतो तव्वाबारेऽवि णोवलंभाउ । इंदियभिण्णो णाया पंचगवक्खोवलद्धा व ।। ३८६५ ॥ णाणरहितो न जीवो सभावतोऽणुव्व मुत्तिभावेण । जं तेण विरुद्धमिदं अत्थि य सो नाणरहिओ य ॥ ३८६६ ॥ किह सोनाणसरूवो णणु पञ्चक्खाणुभूतियो नियये । परदेहंमिवि गम्मति स पवित्तिनिवित्तिलिंगाउ ॥ ३८६७॥ सव्वावरणावगमे सो सुद्धतरो हवेज्ज सूरोव्व । तम्मय भावाभावादण्णाणित्तं ण जुत्तं से ||३८६८|| एवं पयासमतिओ जीवो छिद्दावभासयत्ताओ। किंचिम्मत्तं भासह छि (ड्डा) वरणप्पदीवोव्व ॥ ३८६९॥ बहुयतरं वियाई मुत्तो सव्वप्पिहाणविगमाउ । अवणीयघरो व्व णरो विगयावरणोऽहवा दीवो ॥ ३८७० ॥ अस्थि माणुसणं तं सोक्खं नवि य सव्वदेवाणं । जं सिद्धाणं सोक्खं अव्वाबाहं उवगयाणं ॥ ९७८॥ सुरगणसुहं संमत्तं सव्वद्धापिंडियं जइ हवेज्जा । नवि पावइ मुत्तिसुहं णंतेहिवि वग्गवग्गेहिं ॥ ९७९।। सिद्धस्स सुहो रासी सव्वद्धापिंडिओ जइ हवेज्जा | सोऽणंतभागभइओ सव्वागासे ण माएज्जा ॥ ९८० ॥ जह नाम कोइ मेच्छो जगरगुणे बहुविहे विताणंतो। ण चइए परिकहेउं उवमाऍ तहिं असंती ॥ ९८९ ॥ | इय सिद्धाणं सोक्खं अणोवमं नत्थि तस्स ओवम्मं । किंचि विसेसेणेत्तो सारिक्खमिणं सुणह वोच्छं ॥ ९८२ ॥ |जह सव्वकामगुणियं पुरिसो भोत्तूण भोयणं कोई । तण्हाछुहाविमुको अच्छेज्ज जहा अमततित्तो ॥ ९८३ ॥ I सिद्धानां सौख्यं ॥८९३॥

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