Book Title: Nyayacharya Yashovijayji Krut Granthmala
Author(s): Jain Dharm Prasarak Sabha
Publisher: Jain Dharm Prasarak Sabha

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Page 12
________________ श्रीमद्य जन्मच ॥६॥ || शकातुं नथी. काशीमां श्रन्यास करावनारा पंमितो ब्राह्मणजातिना हता अने ते जैनमति प्रत्ये फेषबुद्धि धरावता हता. बतां तीव्रबुद्धि, गुरुनक्ति तेमज विनयगुणनी प्राधान्यता विगेरे कारणोथी एमणे पोताना अध्यापकनी सारी प्रीति संपादन करी हती अने तेने परिणामेज एजे साहेब पूरतो अन्यास करी शक्या हता. काशीमा प्रथम तेमने || 'न्यायविशारद' एq बिरुद श्रापवामां आव्यु हतुं अने न्यायसंबंधी सो ग्रंथो रच्या बाद अन्य मतना सर्व विधानो तरफथी। 'न्यायाचार्य' नुं बीरुद मळ्युं हतुं. आ हकीकत जैनतर्कपरिलाषा ग्रंथनी प्रशस्ति उपरथी स्पष्ट रीते नीकळी आवे जे. __काशीमां अन्यास करीने आव्या बाद तेमणे धर्मशास्त्रनो अत्युत्कृष्ट श्रन्यास को हतो परंतु तेमने अध्ययन करावनार धुरंधर गुरु कोण हता ते जाणी शकायुं नथी. खास करीने क्योपशमना बळवंतपणाथी तेमज विनयादि गुणना अतिशयपणाथी तेश्रोनुं ज्ञान अत्यंत स्फुरायमान अयुं हतुं. तेमनी प्रबळ ज्ञानशक्तिना कारणथी जैनवर्गमां पण तेमन महत्व बहु वृद्धि पाम्युं हतुं, तेवा वखतमां काशीमां जेनी पासे अन्यास करेलो ते विद्यागुरु आर्थिक स्थितिनी मंद ताना कारणथी खन्नातमा तेमनी पासे आव्या हता ते वखते तेमनो बहु सत्कार करवा उपरांत तेमने एक सारी रकम MI(३६०००) पण गुरुदक्षिणा तरीके श्रीसंघे आपी प्रसन्न कर्या हता. आ वखतमां जिनप्रतिमाने नहि माननार ढुंढकमतनी स्थिति कांक प्रबळ जणातां उपाध्यायजी महाराजे प्रतिमा शतक नामनो ग्रंथ स्वोपज्ञ टीकावाळो रची तेमना उपर प्रबळ असर करी हती, जेथी ते तेमनापर बहु गुस्से श्रया हता. उपाध्यायजी महाराजे तेमनाथी किंचित् पण मर न खाता बींबमीना रहीश शा मेघजी दोशी विगेरे गुजराती

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