________________ 6/ श्रीगौतमस्वामी-चरित्रनो शास्त्रो तणां परमार्थने जे मळनार हतां घणां, ते पांच सो छात्रो तथा वीजा घणा पण पंडितो। जस पास शिष्यपणुं लईने धन्य निजने लेखता, ते मंगलार्थ श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 6 // गुरुवर्य ! आप सरस्वतीना पूर्ण कृपापात्र छो, वळी वादीगण तम बाळ छो, ने सकल शास्त्र सगुद्र छो। बिरुदावली जस बोळी छात्रो जगत करता गाजतु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 7 // विपरीत अर्थों वेदपदना करी शंका ऊपजी, शुजीव छे के नहिं अरे ! के मात्र पचभूत छ / शंकित छतां निःशंक थई निजने गणे सर्वज्ञ जे, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पद.ज नमु // 8 // आज्ञा स्वीकारी जेहनी स्वदेश ने परदेशथी, आव्यां घणांये पंडितो ने अन्य जन पण हर्षथी। नगरी अपापामां अनोखो यज्ञ जेणे आदर्यो, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 9 // मेघ - सम गंभीर रवथी वेदसूक्तो उच्चरी, श्रीइन्द्रभूति यज्ञविधि ज्यारे करावे हर्षथी / निरखी सुखी सौ लोक त्यारे हर्षपुलकित थइ जतां, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु॥१०॥ विमल केवलज्ञानथी जे लोक तेम अलोक ने, करतल-बदर जिम निरखतां श्रीवीरविभु शासनपति / नगरी अपापाए पधार्या जेहवा सद्भाग्यथी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 1 // त्यां सज्जनोथी आगमन श्रीवीरविभुनु सांभळी, ... आश्चर्यकारी तेम लोकोत्तर गुणो भणी करी। प्रमोदने बदले थयु अभिमान मनमां जेहने, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 12 / / P.P.AC.Gunratnasuri M.S.. Jun Gun Aaradhak Trust