________________ गुजराती पद्यानुवाद 7 सुर ठोकथी प्रभु वांदवाने देवगण उल्लासथी, आवी रह्या ज्यारे हता त्यारे थयुजस चित्तमां। साक्षात् देवो यज्ञमां आवी रह्या ए तो जुओं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 13 / / ज्यारे बधा ते देवता मूकी यज्ञने आगळ गयां,। त्यारे हृदयमां खिन्न थई करतां विकल्पो ते घणां / साचे ज आ महाधूर्त छ, नहिं तो बने आव नहिं, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 14 // मुज जीवतां छे कोण जे सर्वज्ञ निजने लेखतो, वळी सर्वगुण सम्पन्नरूपे जेने सह जन मानता। एवा विचारे रोषथी थयु उग्र चित्त जेहनु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 15 // क्षणवार पण हुं ना सहुं अभिमान एनु एहवु, इम चितवी निज बंधुओथी वारवा जडतां घणु / निज पचशत छायो लईने जेह जितवा नीकल्या, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 16 // आव्या समोसर रणे निहाळया वीर विभुने जे समे, .. अद्भुत अलौकिक रूप निरखी पाम्या विस्मय तें समे। आ कोण ब्रह्मा, विष्णु के शिव एम जस मनमां थयु, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु॥१७॥ मुजने सूचुआ शु? अने आव्यो अहिंआ कारणे? आज्यो अहिं ना होत तो शी हानि मुजने थात रे। जस चित्तमां चिन्ता घणी निज कीर्तिना रक्षण तणी, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 18 // सद्भाग्य योगे थाय जो मुज जीत अहिं आ वादमां, सह पंडितोमां तो बनु बेजोड हं आ विश्वमां। करता विचारो आम ते आव्या समोसरणे मदा, ते मंगलार्थे श्रीगुरुगौतमतणां पदकज नमु // 19 // P.P.AC. GunratnasuriM.S. Jun Gun Aaradhak Trust