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________________ २/वर्णक्रम-सूक्ति-पञ्चाशिका लुकारो लघुताया हि, माहात्म्येन ऋमित्रताम् / भेजे भुवि सुहृद्भावं, भजन्ते सरला जनाः // 9 // यदि दीर्घतां प्राप्तस्तदा नेच्छन्ति केचन / सर्वसन्माननेच्छूनां, दीर्घता प्रतिबन्धिका // 10 // एक एव गुणो लोके, महाँश्चेत् प्रथयत्यलम् / सद्गन्धस्यैव माहात्म्यात्, कुरङ्गो भुवि विश्रुतः // 11 // ऐन्द्रवृन्दनतः स स्यादिन्द्रं ध्यायति यः सदा / यादृग्बीजं भवेदुप्तं, ताहगेव फलं भवेत् // 12 // ओषधिः सम्भवेन्मूलमात्रं योजकयोगतः।। एकात् परं नियुक्ता हि, गणनां यान्ति बिन्दवः // 13 // औन्नत्यं भजते काले, क्षुद्रोऽपि सरसो जनः / यौवनसमये प्राप्ते, कामिनीकुचकुम्भवत् // 14 // अंनासिक्यमनुस्वारं, वदन्ति वै विपश्चितः / स्वरं येऽनुसृतास्ते तु बिन्दुभावेन संस्थिताः // 15 // अःकण्ठयोऽपि विसर्गोऽपि, स्वरैः सृष्टोऽपि सस्वरः / निष्ठया सोऽनुलग्नस्तं, निष्ठा हि कार्यसाधिका // 16 // कर्मण एव सामर्थ्यमेको दुःख्यपरः सुखी / भाग्यनाप भवो भूति, विभूति श्रीपतिस्तथा // 17 // खलेन सहसौहार्द, विधेयं नैव धीमता। समागते तु मध्याह्ने छायेव नैव दृश्यते // 18 // गर्दभा इव ये मूढा, आग्रहवशवर्तिनः / / दण्डप्रहारमुग्रं ते, प्राप्नुवन्ति पदे पदे // 19 // P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036425
Book TitleChar Granth Sangraha - Panch Parmeshthi Gunmala - Chaturvinshati Jinstutaya - Varnakram Sukti Panchashika - Gautam Swami Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaydharmdhurandharsuri
PublisherSyadvadamrut Prakashan Mandir
Publication Year1994
Total Pages145
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size98 MB
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