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________________ | ६४१ । शास्त्रपाठोंके तात्पर्यार्थ को, याने-सिद्धान्तके रहस्यको जानने वाले सबी आचार्यादि छ कल्याणक मानते आये तैसेही तपगच्छके कुलमंटनसूरिजी वगैरहोंने भी छ कल्याणक लिखे सो एक एकके अनुकरण मुजब कथन करना सो तो पम्परा. गम कहा जाता है इसलिये आप लोगोंकों भी छ कल्याणकके निषेध करनेकी कुयुक्तियों करनेके हटवादको छोड़कर उत्सूत्रप्ररूप्रणाके पापसे बचने के लिये शास्त्रानुसार आपके पूर्वजोंके कथन मुजब छ कल्याणक मान्य करने चाहिये जिससे शास्त्र पाठोंके उत्थापनके तथा पूर्वाचार्यो की अवज्ञाके दूषणसे संसार वृद्धिके कारणका वचाव होकर निजपरके आत्म कल्याणमें उद्यम करनेका अवसर मिले और उसकी सफलता प्राप्त होनेका कारण आपके बने आगे आपकी इच्छा। . और ऊपरके लेखमें अनुकरण करनेका लिखके पूर्व पक्ष उठाकर उसके उत्तरमें श्रीजिनवल्लभसूरिजोपर आक्षेप करके वोही आक्षेपकी बात अपने पूर्वजपर गेरनेका लिखा सो तो ऊपरकेले खसे न्यायांभोनिधिजीकी अज्ञानताके परदोंके सबभेदको पाठक गण स्वयं समज सकेंगे क्योंकि श्रीजिनवल्लभसूरिजीका सत्यवातमें शास्त्रानुसार कथनका अनुकरण श्रीकुलमण्डनसूरिजीने किया सो शास्त्रानुसार सत्यबात इन्होंसे मंजूर न होसकी उससे कुविकल्प उठाकर भद्र जीवोंको भी भरमाये और पूर्वपक्ष उठाना भी मायातिकी अज्ञानताका सूचक है क्योंकि खरतर गच्छवाले ऐसा पूर्वपक्ष कदापि नहीं उठा सकते हैं इसलिये पूर्वपक्षका उठाना और उसका उत्तरमें मनमाना जटपटाङ्ग गप्प लिखना सब व्यर्थ है। ___और आपके पूर्वज सम्बन्धी अब मेरा तो इतनाही कहना है कि चाहेतो हमारे बड़े पूर्वज श्रीजिनवल्लभसूरिजीके शास्त्रोक्त छ ८१ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034474
Book TitleAth Shatkalyanak Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages380
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size33 MB
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