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________________ 4. योग पहले व दूसरे गुणस्थान में आहारक व आहारक मिश्र काययोग को छोड़कर शेष 13 योग पाये जाते हैं। तीसरे गुणस्थान में 4 मन के, 4 वचन के तथा औदारिक व वैक्रिय काययोग ये 10 योग पाये जाते हैं, क्योंकि मिश्र गुणस्थान में किसी भी लब्धि का प्रयोग नहीं होता है। चौथे गुणस्थान में आहारक व आहारक मिश्र को छोड़कर 13 योग होते हैं। पाँचवें गुणस्थान में कार्मण काययोग भी नहीं मिलता, अत: आहारक, आहारक मिश्र व कार्मण को छोड़कर 12 योग मिलते हैं। छठे गुणस्थान में आहारक लब्धि, वैक्रिय लब्धि आदि का प्रयोग हो सकता है अत: कार्मण काय योग को छोड़कर 14 योग हो सकते हैं। सातवें से लेकर 12वें गुणस्थान तक अप्रमत्तता होने से किसी भी लब्धि का प्रयोग नहीं होता, अत: 4 मन के, 4 वचन के, 1 औदारिक का, इस प्रकार से 9 योग मिलते हैं। तेरहवें गुणस्थान में सत्य व व्यवहार मनोयोग, सत्य व व्यवहार भाषा, औदारिक काय योग, इस प्रकार 5 योग होते हैं। यदि कोई केवली केवली समुद्घात करें तो उसमें उस समय औदारिक मिश्र व कार्मण ये दो योग पाये जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर 7 योग 13वें गुरस्थान में मिल सकते हैं। 14वाँ गुणस्थान अयोगी होने से वहाँ किसी भी प्रकार का योग नहीं मिलता है। 42
SR No.034370
Book TitleRatnastok Mnjusha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDharmchand Jain
PublisherSamyaggyan Pracharak Mandal
Publication Year2016
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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