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________________ [२.५] वीतरागता ऐसा कुछ है ही नहीं । सुगंध हो या दुर्गंध हो, कुदरत के घर दोनों एक सरीखे हैं। वहाँ पर एक सरीखे ही हैं और यहाँ पर एक सरीखे नहीं हैं । वहाँ पर एक समान किस प्रकार से हैं ? तो कहते हैं, सबकुछ ज्ञेय के रूप में है। १५९ प्रश्नकर्ता : तो अगर ज्ञाता - दृष्टा हो जाएँ तो ज्ञेयों के प्रति आसानी से उदासीनता रहेगी ? दादाश्री : हाँ! वह तो स्वभाव से उदासीनता ही। उसका अन्य कोई गुण है ही नहीं! उदासीन ही है न! अहंकार सहित वीतरागता रहे तो वह है उदासीनता ! उसे वीतरागता नहीं कहते क्योंकि अभी तक अहंकार का पॉइज़न है और यह बिना पॉइज़न का है इसलिए इसे वीतरागता कहते हैं I अब क्रमिक मार्ग में इसे उदासीनता कहते हैं। अंतिम अवतार में वीतराग । जबकि यहाँ पर तो ज्ञान मिलते ही वीतराग । सिर्फ समझना ही है, करना कुछ भी नहीं है । हैं न? दादा देखें विशालता से और अनुभव करें ऐश्वर्य प्रश्नकर्ता : कई बार ऐसा होता है कि सभी इन्द्रियाँ वीतराग ही दादाश्री : मतलब ? प्रश्नकर्ता : वीतराग नहीं, लेकिन उन्हें राग-द्वेष नहीं होते कोई । हमने आँखों से किसी चीज़ को देखा हो तो आँखों का गुण तो उन चीज़ों को दिखाने का ही है न ? दादाश्री : दिखाती हैं, बस । हम यहाँ पर एक दूरबीन में से देखें, तो वह दूरबीन बेचारी क्या करे ? उस दूरबीन में से देखने वाले को राग है इसीलिए उस तरफ राग है । अर्थात् अगर आपमें अज्ञान है तो सभी कुछ उल्टा दिखाई देगा । इन्द्रिय बेचारी क्या करे ? मुझे लोग कहते हैं
SR No.034041
Book TitleAptvani 13 Uttararddh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDada Bhagwan
PublisherDada Bhagwan Aradhana Trust
Publication Year2018
Total Pages540
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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