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________________ ४७ अभिनव प्राकृत-व्याकरण रिऊ, उदू ऋतुः रिसी, इसी = ऋषि: रिद्धी<ऋद्धिः ( ९२ ) जिस दृश् धातु के आगे कृत् , क्विप, स्क् और सक प्रत्यय आये हों, उसके ऋ का रि आदेश होता है। जैसे एआरिसो< एतादृशः-त् का कोप स्वर शेष, दू का लोप और ऋ के स्थान पर 'रि'। तारिसोद तादृश:-ह में से दू का लोप और के स्थान पर रि। सरिसोरसदृशः- " " सरिच्छो< सदृक्षः , ,, क्ष के स्थान पर च्छ । भवारिसोरभवाश:- दू का लोप और ऋ के स्थान पर रि। जारिसो< यादृशः- , केरिसो< कीदृश:-की के स्थान पर के और दू का लोप, ऋ के स्थान पर रि। अम्हारिच्छो< अस्मादृक्ष:-दू का लोप, ऋ के स्थान पर 'रि', क्ष के स्थान पर छ। अन्नारिसो< अन्यादृशः-न्या के स्थान पर न्ना, दू का लोप, ऋ के स्थान पर 'रि'। अम्हारिसो< अस्माईश:-स्मा के स्थान पर म्हा, दू का लोप, ऋ के स्थान पर रि। तुम्हारिसो<युष्मादृशः-मा के स्थान पर म्हा, दू का लोप, र के स्थान पर रि। विशेष-शौरसेनी में उक्त शब्दों के रूप निम्नप्रकार होते हैं। जादिसंरयारशम् तादिसं<तादृशम् पैशाची में-जातिसं< यादृशम् तातिसं< तादृशम् अपभ्रंश में-जइसं< यादृशम् तइसं< तादृशम् (९३ ) किसी भी शब्द में आदि ऐकार का एकार होता है। यथासेलो = शैलः-श के स्थान पर स और ऐकार को एकार । तेल्लुकं, तेल्लोकं < त्रैलोक्यम्-न में से र् का लोप, ऐकार को एकार, च का लोप और क को द्वित्व। सेच्चंदशैत्यम्-ऐकार का एकार, त्य के स्थान पर च । एरावणो< ऐरावत:-ऐकार का एकार और त के स्थान पर ण । १. दृशः क्विप-ट क्सकः ८।१।१४२. । हे० । २. ऐतु एतु ८।१।१४८. । हे०। ...... . ..
SR No.032038
Book TitleAbhinav Prakrit Vyakaran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorN C Shastri
PublisherTara Publications
Publication Year1963
Total Pages566
LanguageHindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size28 MB
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