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________________ श्रष्टमपरिछेद. ॥ अथ अष्टम परिवेदः प्रारंभः ॥ ॥ अथ षौमश संस्कार प्रारंभ ॥ तत्व ज्ञान भयो लोके, य श्राचारं प्रणीतवान् ॥ केनापि हेतुना तस्मै नम श्राद्याययोगिने ॥ गर्भाधानं पुंसवनं जन्मचन्द्रार्कदर्शनम् ॥ कीराशनं चैव षष्ठी तथा च शुचि कर्म च ॥ तथा च नामकरणमन्नप्राशनमेव च ॥ कर्णवेधो मुनं च तथोपनयनं परम् ॥ पाठारम्नो विवाहश्च व्रतारोपोन्तकर्म च ॥ ६०१ मी षोडशसंस्कारा गृहिणां परिकीर्त्तिताः ॥ भाषार्थ : - गर्भाधान, पुंसवन २, जन्म ३, चंद्र. सूर्यदर्शन ४, क्षीराशन ५, षष्ठी ६, शुचिकर्म ७, ना मकरण, अन्नप्राशन ए, कर्णवेध १०, मुंडन ११, उपनयन १२, विद्यारंभ १३, विवाह १४, व्रतारोप १५, अंतकर्म ९६ येह सोलां संस्कार गृहस्थी को करने चहिये व्रतारोपसंस्कारको वर्जके, शेष १५ पंदरां संस्कार, साधु ने नही करणे. संस्कार कराने वाले गुरु विषे श्रर्हन्मंत्रोपनीतश्च ब्राह्मणः परमाईतः ॥ कुलको वाssसगुर्वाज्ञो गृहिसंस्कारमाचरेत् ॥ १॥ अर्थः- अर्हन्मंत्रोपनीत परमश्रावक, ब्राह्मण, श्रौ र प्राप्त करी है गुरुकी आज्ञा जिसने ऐसा क्षुल्लक ७६
SR No.023329
Book TitleJain Dharm Sindhu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMansukhlal Nemichandraji Yati
PublisherMansukhlal Nemichandraji Yati
Publication Year1908
Total Pages858
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size17 MB
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