SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 98
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सुदाक्षिण्य गुण का वर्णन ८७ अशठता रूप सातवा गुण कहा. अब सुदाक्षिण्यता रूप आठवें गुण का वर्णन करते हैं उवयरह सुदक्खिनो परेसिमुज्झियसकजवावारो। तो होइ गज्झवको-गुवत्तणीओ य सबस्स ।। १५ ।। मूल का अर्थ- सुदाक्षिण्य गुण वाला अपना कामकाज छोड़ परोपकार करता रहता है, जिससे उसकी बात सभी मानते हैं तथा सब उसके अनुगामी हो जाते हैं । टीका का अर्थ -सुदाक्षिण्य याने उत्तम दाक्षिण्य गुण युक्त, अभ्यर्थना करते उपकार करता है याने उपकारी होकर चलता है । सुदाक्षिण्य यह कहने का क्या अर्थ ? उसका अर्थ यह है कि-जो परलोक में उपकार करने वाला प्रयोजन हो तो उसी में लालच रखना, परन्तु पाप के हेतु में लालच न रखना, इसी से 'सु' शब्द द्वारा दाक्षिण्य को विभूषित किया है। (उपकार किसका करे सो कहते हैं ) पर याने दूसरों का किस प्रकार सो कहते हैं: स्वकार्य व्यापार छोड़कर याने कि अपने प्रयोजन की प्रवृत्ति छोड़कर भी (परोपकार करे) उस कारण से वह ग्राहृवाक्य याने जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न करे ऐसा होता है, तथा अनुवर्तनीय रहता है याने सर्व धार्मिक जनों को उसकी चेष्टा अच्छी लगती है, कारण किधार्मिक लोग उसके दाक्षिण्य गुण से आकर्षित होकर इच्छा न होते हुए भी धर्म का पालन करते हैं। क्षुल्लक कुमार के समान।
SR No.022137
Book TitleDharmratna Prakaran Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShantisuri, Labhsagar
PublisherAgamoddharak Granthmala
Publication Year
Total Pages308
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy