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________________ ३९२ संक्षिप्त प्राकृत-हिन्दी कोष णिणाय-णिदाह णिणाय पुं [निनाद] आवाज । णित्तल वि [दे] अनिवृत्त । णिण्ण वि [निम्न] नीचा, अधस्तन । णित्ति (अप) देखो णीइ । णिण्णक्खु कि [निस्सारयति] बाहर निक- णित्तिस वि [निस्त्रिंश] करुणा हीन । लता है। णित्तिरडि वि [दे] निरन्तर, अव्यवहित । णिण्णगा स्त्री [निम्नगा] नदी । णित्तिरडिअ वि [दे] त्रुटित, टूटा हुआ । णिण्ण? वि [निर्नष्ट] नाश प्राप्त । णित्तुप्प वि [दे] स्नेह-रहित, घृत आदि से णिण्णय पुं [निर्णय] निश्चय, अवधारण । वर्जित । फैसला। णित्तुल वि [निस्तुल] असाधारण । णिण्णया देखो णिण्णगा। णित्तुस वि [निस्तुष] तुष-रहित, विशुद्ध । णिण्णार वि [निर्नगर] नगर से निर्गत । णित्तेय वि [निस्तेजस्] तेज-रहित । णिण्णाला स्त्री [दे] चञ्चु । णित्थणण न [निस्तनन] विजय-सूचक ध्वनि । णिण्णास सक [ निर् + नाशय् ] विनाश णित्थर सक [निर +तु ] पार करना, पार करना। उतरना। णिण्णिद्द वि [निनिद्र] निद्रा-रहित । णित्थाण वि [निःस्थान] स्थान-रहित, स्थानणिण्णिमेस वि निनिमेष] निमेष-रहित, एक- भ्रष्ट ।। टक । चेष्टा-रहित । अनुपयोगी। णित्थाम वि [ निःस्थामन् ] निर्बल, मन्द । णिण्णी सक [निर् + णी] निश्चय करना। णित्थार सक [ निर् = तारय् ] पार उताणिण्णुण्णअ वि [निम्नोन्नत] ऊँचा-नीचा, रना, तारना। बचाना, छुटकारा देना । विषम। उद्धार करना। णिण्णेह वि [निःस्नेह] स्नेह-रहित । णित्थारग वि [निस्तारक] पार जानेवाला, णिण्हइया स्त्री [निह्नविका] लिपि-विशेष । पार उतरनेवाला। णिण्हग , पुं [निह्नव] सत्य का अपलाप णित्थिण्ण वि[निस्तीर्ण] उत्तीर्ण, पार-प्राप्त । णिण्हय करनेवाला, मिथ्यावादी। अप- जिसको पार किया हो वह । णिण्हव) लाप। |णिदंस सक [ नि+ दर्शय ] उदाहरण । णिण्हव सक [नि + हनु] अपलाप करना। बतलाना, दृष्टान्त दिखाना । दिखाना । णिण्हवग वि [निह्नावक]अपलाप करनेवाला । णिदसण न [निदर्शन] उदाहरण, दृष्टान्त । णिण्हवण वि [निह्नवन] अपलाप-कर्ता । दिखाना। णिण्हविद देखो णिण्हुविद। णिदरिसण देखो णिदंसण । णिण्हुय वि [निहनुत] अपलपित । णिदरिसिम वि [निदर्शित] उपदर्शित, बतणिण्हुव देखो णिण्हव = नि+ ह्र । लाया हुआ। णिण्हविद (शौ) वि [नि + ह्नत] अपलपित । णिदा स्त्री [दे] ज्ञान-युक्त वेदना । जानते हुए णितिय देखो णिच्च। भी की जाती प्राणि-हिंसा । णितुडिअ वि [नितुडित] टूटा हुआ, छिन्न । णिदाण देखो णिआण । णित्त देखो णेत्त। णिदाया देखो णिदा। णित्तम वि [निस्तमस्] अन्धकार-रहित । णिदाह पुं [निदाघ] धाम, उष्ण । ग्रीष्मअज्ञान-रहित । __ काल । जेठ मास । तीसरे नरक का एक www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.016020
Book TitlePrakrit Hindi kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK R Chandra
PublisherPrakrit Jain Vidya Vikas Fund Ahmedabad
Publication Year1987
Total Pages910
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size19 MB
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