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________________ ११४ पं० जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थ (ii) सोनगढ़ में आ० कानजी स्वामी से प्रथम भेंट के समय प्राप्त मूलग्राही संकेत । (iii) आचार्य विद्यासागर जी को समाधि-परान्मुख करने में आगमिक एवं तात्कालिक उपान । (iv) आ० यान्तिसागर जी, आ. सूर्यसागर जी. बुधसागर जी, बाबा वर्णी जी, निर्वाणसागर जी व पूज्य समंतभद्र जी महाराज आदि के संपर्कों की कहानी। (५) पुरातन विद्वद्वर्ग एवं श्रेष्ठि वर्ग का सामाजिक-साहित्यिक योगदान । (vi) जैन समाज की विभिन्न संस्थाओं का मूल्यांकन और मार्ग निर्देश । (vii) प्रतिष्ठा महोत्सव, धार्मिक महोत्सव, सामाजिक उत्सवों से सम्बन्धित कडुवे-मीठे संस्मरण और उद्बोधन । पंडित जी पिछले चार दशक से समाज की चतुर्मुखी प्रवृत्तियों से सम्बन्धित हैं। श्री धन्यकुमार जी सिंघई से मेरा निवेदन है कि वे पंडित जी के साथ एक-दो माह के लिये किसी व्यक्ति को रखकर उनकी सक्रिय जीवनी लेखन का श्रेयस्कर कार्य करावें। इस चित्रण से न केवल जैन समाज का इतिहास सामने आवेगा, अपितु नये कार्यकर्ता भी लाभान्वित होंगे। मेरी कामना है कि आपको चिरायुषता का लाभ हो एवं समाज को उनकी परमोपकारी छत्र-छाया प्राप्त होती रहे। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012026
Book TitleJaganmohanlal Pandita Sadhuwad Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherJaganmohanlal Shastri Sadhuwad Samiti Jabalpur
Publication Year1989
Total Pages610
LanguageHindi, English
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size14 MB
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