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________________ १९ राजवन्द्र और उनका संक्षिप्त परिचय भी नदीको पार करने जैसे प्राणातिपातरूप प्रसंगकी आशा करनी पड़ी है। जिस आशाका, यदि लोकसमुदायका विशेष समागम करके, साधु आराधन करेगा, तो पंच महावोंके निर्मूल होनेका समय आयेगायह जानकर भगवान्ने नदी पार करनेकी आशा दी है। वह आशा, प्रत्यक्ष प्राणातिपातरूप होनेपर भी पाँच महायतोंकी रक्षाका हेतुरूप जो कारण है, वह प्राणातिपातकी निवृत्तिका ही हेतु है। यद्यपि प्राणातिपात होनेपर भी नदीके पार करनेकी अप्राणातिपातरूप आशा होती है, फिर भी ' सब प्रकारके प्राणातिपातसे निवृत्त होता हूँ'-नस वाक्यको एक बार क्षति पहुँचती है। परन्तु यह क्षति फिरसे विचार करनेपर तो उसकी विशेष हड़ताके लिये ही मालूम होती है । इसी तरह दूसरे ब्रोंके लिये भी है । 'मैं परिग्रहकी सर्वथा निवृत्ति करता हूँ'-इस प्रकारका व्रत होनेपर भी वस्त्र पात्र और पुस्तकका संबंध देखा जाता है-इन्हें अंगीकार किया जाता है। उसका, परिग्रहकी सर्वथा निवृत्ति के कारणका किसी प्रकारसे रक्षणरूप होनेसे विधान किया है, और उससे परिणाममें अपरिग्रह ही होता है। मूछारहित भावसे नित्य आत्मदशाकी वृद्धि होनेके लिये ही पुस्तकका अंगीकार करना बताया है । तथा इस कालमें शरीरके संहननकी हीनता देखकर पहिले चित्तकी स्थितिके समभाव रहनेके लिये ही वस्त्र, पात्र आदिका ग्रहण करना बताया है, अर्थात् जब आत्म-हित देखा तो परिग्रह रखनेकी आशा दी। मैथुनत्यागमें जो अपवाद नहीं है, उसका कारण यह है कि उसका रागद्वेषके बिना भंग नहीं हो सकता; और रागद्वेष आत्माको अहितकारी है; इससे भगवान्ने उसमें कोई अपवाद नहीं बताया। नदीका पार करना रागद्वेषके बिना हो सकता है; पुस्तकका ग्रहण करना भी रागद्वेषके बिना होना संभव है; परन्तु मैथुनका सेवन रागद्वेषके बिना संभव नहीं हो सकता । इसलिये भगवान्ने इस व्रतको अपवादरहित कहा है, और दूसरे व्रतोंमें आत्मांक हितके लिए ही अपवाद कहा है। इस कारण जिस तरह जीवका-संयमका-रक्षण हो, उसी तरह कहनेके लिये जिनागमकी रचना की गई है। पत्र लिखने अथवा समाचार आदि कहनेका जो निषेध किया है, उसका भी यही हेतु है। जिससे लोक-समागमकी वृद्धि न हो, प्रीति-अप्रीतिके कारणकी वृद्धि न हो, स्त्रियों आदिके परिचयमें आनेका प्रयोजन न हो, संयम शिथिल न हो जाय, उस उस प्रकारका परिग्रह बिना कारण ही स्वीकृत न हो जाय-इस प्रकारके सम्मिलित अनंत कारणोंको देखकर पत्र आदिका निषेध किया है, परन्तु वह भी अपवादसहित है। जैसे बहत्कल्पमें अनार्यभूमिमें विचरनेकी मना की है, और वहाँ क्षेत्रकी मर्यादा बाँधी है, परन्तु शान दर्शन और संयमके कारण वहाँ भी विचरनेका विधान किया गया है। इसी अर्थक उपरसे मालूम होता है कि यदि कोई ज्ञानी पुरुष दूर रहता हो-उनका समागम होना मुश्किल हो, और यदि पत्र-समाचारके सिवाय दूसरा कोई उपाय न हो तो फिर आत्महितके सिवाय दूसरी सब प्रकारकी बुद्धिका त्याग करके उस ज्ञानी पुरुषकी आज्ञासे, अथवा किसी मुमुक्षु-सत्संगीकी सामान्य आशासे नेसा करनेका जिनागमसे निषेध नहीं होता, ऐसा मालूम होता है'। केवलज्ञान (.) प्रश्न:-क्या भूत, भविष्य और वर्तमानकालकी अनन्त पर्यायोंके युगपत् शान होनेको केवलशान कहते हैं। उत्तर:-(क) सर्व देश, काल आदिका शान केवलज्ञानीको होता है, ऐसा जिनागमका वर्तमानमें रूदि अर्थ है। यदि वही केवलज्ञानका अर्थ हो तो उसमें बहुतसा विरोष दिखाई देता है। यदि जिनसम्मत केवलज्ञानको लोकालोकशायक माने तो उस केवलशानमें आहार, निहार, विहार आदि क्रियायें किस तरह हो सकती है।' योगधारीपना अर्थात् मन, वचन और कायासहित स्थिति होनेसे, आहार आदिके लिये प्रवृत्ति होते समय उपयोगांतर हो जानेसे उसमें कुछ भी वृत्तिका अर्थात् उपयोगका निरोष होना संभव है। एक समयमै १४१४-३७६,७-२७. १५९९-४९२-२९.
SR No.010763
Book TitleShrimad Rajchandra Vachnamrut in Hindi
Original Sutra AuthorShrimad Rajchandra
Author
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1938
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, N000, & N001
File Size86 MB
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