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________________ औपदे शक पद ६१ - कामणी कपट महा कुडि मंडी, खबरि करे फाल खातो। कहे धर्मसीह उलंगीसि वाको, तेरी सफल कला तो । मन । ३ । ( २१ ) राग-कल्याण हु तेरी चेरी भई, तु न धरे हेत रे । • एक पखी प्रीति कौसौ, आइ वण्यो वेतरे । १ । हु.।। दूर छोड जाइ के, सदेसहु न देत रे। लोक लाज काजहुँ न, मेरी सुधि लेत रे । हुं । २।। तुठौर ठौर करै । और सु सकेत रे। । रंग बिना सग करै, तामे परो रेत रे । हुँ ।३। तोही सु सचेत मे तौं, तो बिन अचेत रे। मेरो धर्मसील रहै, तोही सु समेत रे । हु०। ४ । ( २२ ) राग-जयवती काया माया वादल की छाया सी कहातु है। मेरो बैन मान यार, कहत हुं वार वार । हित ही की वात चेत, कहा न गहात है। का०।१। नीकै दिल दान देहु, लोकनि मे सोभ लेहु । सुंव की विसात भैया, मोहे न सुहात है। का० । २।। खाना सुलताना, राउ राना ही कहाना सव । वातनका बात जग कोऊ न रहात है।
SR No.010705
Book TitleDharmvarddhan Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1950
Total Pages478
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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