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________________ दुर्बुद्धि marne ध्वनित होने लगता-"वह बूढ़ा तुम्हारे पैरों पड़कर क्यों रोता था ?" और उस समय मेरे हृदयमें शूलकी-सी वेदना होने लगती । मैंने दरिद्र हरनाथके जीर्ण। घरकी मरम्मत अपने खर्चसे करा दी । एक दुधारू गाय उसे दे दी और उसकी जो जमीन महाजनके यहाँ गिरवी रक्खी गई थी उसका भी उद्धार करा दिया। ___ मैं कन्या-शोककी दुःसह वेदनासे कभी कभी रात-रातभर करवटें बदलता पड़ा रहता-घड़ी-भरको भी नींद न आती। उस समय सोचता कि यद्यपि मेरी कोमलहृदया कन्या संसार-लीलाको शेष करके चली गई है, तो भी उसे अपने बापके निष्ठुर दुष्कर्मों के कारण परलोकमें भी शान्ति नहीं मिल रही है - वह मानो व्यथित होकर बार बार यही प्रश्न करती है कि-पिताजी, तुमने ऐसा क्यों किया? कुछ दिन तक मेरा यह हाल रहा कि मैं गरीबोंका इलाज करके उनसे फ़ीसके लिए तकाजा न कर सकता । यदि किसी लड़कीको कोई बीमारी हो जाती तो ऐसा मालूम होता कि मेरी सावित्री ही सारे गाँवकी बीमार लड़कियों के बीचमें रोग भोग रही है। एक दिन मूसलधार पानी बरसा । सारी रात बीत गई, पर वर्षा बन्द न हुई । जहाँ तहाँ पानी ही पानी दिखाई देने लगा । घरसे बाहर जानेके लिए भी नावकी जरूरत पड़ने लगी। उस दिन मेरे लिए मालगुजार साहबके यहाँसे बुलावा आया । मालगुजारकी नावके मल्लाहोंको मेरा जरा भी विलम्ब सह्य नहीं हो रहा था; वे तकाजेपर तकाजा कर रहे थे ।
SR No.010680
Book TitleRavindra Katha Kunj
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi, Ramchandra Varma
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1938
Total Pages199
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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