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( ५ ) सम्यग्दर्शन से शुद्ध हुए जीव, अव्रती होने पर भी, नारक, तिर्यंच, नपुंसक और स्त्रीपर्यायको धारण नहीं करते, न दुष्कुलोंमें जन्म लेते हैं, न विकृतांग तथा अल्पायु होते हैं और न दरिद्रीपने को ही पाते हैं ।
द्वितीय परिच्छेद में सम्यग्ज्ञानका लक्षण देकर उसके विषयभूत प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोगका सामान्य स्वरूप दिया है |
तीसरे परिच्छेद में सम्यक्चारित्रके धारण करनेकी पात्रता और आवश्यकताका वर्णन करते हुए उसे हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुनसेवा और परिग्रहरूप 'पापप्रणालिकाओंसे विरतिरूप बतलाया है । साथ ही, चारित्रके ' सकल' और 'विकल' ऐसे दो मेद करके और यह जतलाकर कि सकल चारित्र सर्व संगविरत मुनियों होता है और विकलचारित्र परिग्रहसहित गृहस्थोंके, गृहस्थोंके योग्य विकलचारित्र के बारह भेद किये हैं; जिनमें पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षा शामिल हैं। इसके बाद हिंसा, असत्य, चोरी, कामसेवा और परिग्रहरूपी पाँच पापोंके स्थूलरूपसे त्यागको 'अणुव्रत' बतलाया है और अहिंसादि पाँचों अणुव्रतोंका स्वरूप उनके पाँच पाँच अतीचारों सहित दिया है। साथ ही, यह प्रतिपादन किया है कि मद्य, मांस और मधुके त्यागसहित ये पंचअणुव्रत गृहस्थोंके 'अष्ट मूलगुण' कहलाते हैं ।
चौथे परिच्छेद में दिग्व्रत, अनर्थदण्डव्रत और भोगोपभोगपरिमाण नामसे -तीन गुणा उनके पाँच पाँच अतिचारोंसहित कथन है; पापोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और प्रमादचर्या ऐसे अनर्थदंडके पाँच भेदों का वर्णन है और भोगोपभोगकी व्याख्या के साथ उसमें कुछ विशेष त्यागका . विधान, व्रतका लक्षण और यमनियमका स्वरूप भी दिया है ।
पाँचवें परिच्छेद में देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और वैयावृत्य नामके चार शिक्षाव्रतोंका, उनके पाँच पाँच अतीचारोंसहित, वर्णन है । सामायिक और प्रोषधोपवासके कथनमें कुछ विशेष कर्तव्योंका भी उल्लेख किया
और सामायिक समय गृहस्थको 'चेलोपसृष्ट मुनि' की उपमा दी है । वैय्यात् संयमियों को दान देने और देवाधिदेवकी पूजा करनेका भी विधान किया है और उस दानके आहार, औषध, उपकरण, आवास ऐसे चार भेद किवे हैं ।
छठे परिच्छेद में, अनुष्ठानावस्था के निर्देशसहित, सल्लेखना ( समाधिमरण )-- का स्वरूप और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हुए, संक्षेपमें समाधि
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