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________________ भगवान् महावीर की दीक्षा पर इतने घू से मारे वश में हो गया । इस और तब से सब लोग चलाई, किन्तु वर्द्धमान बड़ी कुशलता से उसकी सूड के ऊपर से चढकर उसके मस्तक पर पहुँच गए । वहा जाकर उन्होने उसके मस्तक कि हाथी का मद उतर गया और वह पूर्णतया उनके 'घटना से नगर में बडा भारी आश्चर्य प्रकट किया गया इन्हे महावीर कहने लगे । एक बार यह बालको के साथ वृक्ष पर खेल रहे थे कि एक महाकाय सर्प ने वृक्ष की खोखल मे से निकल कर वृक्ष को घेर लिया । लडके वृक्ष के ऊपर से भय के मारे गिरने लगे, किन्तु यह उस सर्प के सिर पर पैर रख कर उतर आए । क्रमश वह सभी विद्याओ को पढकर भारी विद्वान् बन गए । अब कुण्डपुर मे घर-घर बधाइया गाई जा रही है । प्रत्येक व्यक्ति के मन मे भारी उत्साह है । राजा सिद्धार्थ तथा महारानी त्रिशला देवी के तो पूछने ही क्या । उनको तो अब तीनो लोक की सम्पदा प्राप्त होने जैसा आनन्द आ रहा है । उनके पुत्र वर्द्धमान महावीर आज तीस वर्ष की आयु को पार करके इकतीसवे वर्ष मे प्रवेश कर रहे है और इसीलिये उनको गृहस्थ के बधन मे बाधने की तैयारी की जा रही है । उनके विवाह की तैयारी का उत्साह सारे नगर मे था । किन्तु एक ओर जहा प्रसन्नता के बाजे बज रहे थे, वहा दूसरी ओर भगवान् महावीर स्वामी के मन पर भारी बोझ सा बढता जाता था । उनको ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उनको कोई बलात् पर्वत के ऊपर घसीट कर इसीलिये ले जा रहा हो कि उन्हे वहा ले जाकर वहा से नीचे धक्का दे दिया जावे । वह अपने अध्ययन कक्ष मे जाकर इस प्रकार विचार करने लगे । " समझ मे नही आता यह तमाशा क्यो किया जा रहा है । मेरे जीवन का लक्ष्य तो गृहस्थ सुखो का भोग करना नही है । मै पिताजी तथा माताजी दोनो को पर्याप्त सकेत कर चुका हू कि मैने जन्म भर ब्रह्मचारी रहना है, किन्तु यह लोग मुक से बिना पूछे ही विवाह की तैयारी कर रहे है । क्या करूँ, कुछ समझ मे नही आता ? यदि मुँह खोल कर कहता हू तो सब कोई यहीं कहेंगे कि लडका निर्लज्ज है और यदि नही कहता हू तो अनन्त ससार-सागर में गिरना पड़ेगा ।
SR No.010589
Book TitleShrenik Bimbsr
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandrashekhar Shastri
PublisherRigal Book Depo
Publication Year1954
Total Pages288
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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