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________________ २६० और चारित्र प्रशसित नही होते । सम्यक्त्व विमर्श -D एक आचार्य ने सम्यक्त्व का महत्व बताते हुए लिखा किअसमसुखनिधानं, धाम संविग्नतायाः, भवसुख विमुखत्वो, -द्दीपने सद्विवेकः । नरनरकपशुत्वो-च्छेदहेतुर्नराणाम्, शिवसुखतरु बीजं, शुद्ध सम्यक्त्व लाभ: ॥ 1 - शुद्ध सम्यक्त्व, अतुल सुख का निधान है । वैराग्य का धाम है । संसार के क्षण-भगुर और नाशवान सुखो की असारता समझने के लिए सद्विवेक रूप है । भव्य जीवो के नरक, तिर्यंच और मनुष्य सवधी दुखो का नाश करने वाला है और शुद्ध सम्यक्त्व की प्राप्ति ही मोक्ष सुख-रूप महावृक्ष के बीज के समान है । दिगम्बर आचार्य श्री शुभचन्द्रजी ने ज्ञानार्णव मे कहा है कि सद्दर्शनमहारत्नं, विश्वलोकैकभूषणम् । मुक्तिपर्यन्त कल्याण, दानदक्षं प्रकीर्तितम् ॥ सम्यग्र्शन, सभी रत्नो मे महान् रत्न है, समस्त लोक का भूपण है और श्रात्मा को मुक्ति प्राप्त होने तक कल्याण-मंगल देने वाला चतुर दाता है । चरणज्ञानयोर्वोजं, यमप्रशमजीवितम् । तपः श्रुताद्यधिष्ठानं, सद्भिः सद्दर्शनं मतम् ॥ सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र का बीज है । व्रत महा
SR No.010468
Book TitleSamyaktva Vimarsh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanlal Doshi
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year1966
Total Pages329
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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