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________________ चतुर्थभाग २३ स्वामी अन्तरजामी, भव्यनिको सुखदाय ॥ हमको ० ॥२॥ जाके चार घातिया वीते, दोप जु गये विलाय । सहित अनन्त चतुष्टय साहब, महिमा कही न जाय ॥ हमको ० || ३ || तकि या बड़ो मिल्यो है हमको, गहि रहिये मन लाय । द्यानत औसर बीत जायगो, फेर न कछू उपाय || हमको ० ॥ ४ ॥ ४३ | ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी, नेमिजी ! तुम ही हो नानी ॥टेक॥ तुम्हीं देव गुरु तुम्हीं हमारे, सकल दरव जानी || ज्ञानी० ॥ १ ॥ तुम समान कोउ देव न देख्या, तीन भवन छानी । आप तरे भविजीवनि तारे, ममता नहिं आनी || ज्ञानी० ॥ २ ॥ और देव सब रागी द्वेपी, कामी के मानी। तुम हो वीतराग अकपायी, तजि राजुल रानी || ज्ञानी० ॥ ३ ॥ यह संसार दुःख ज्वाला तजि, भये मुकतथानी । द्यानतदास निकास जगततें, हम गरीब प्रानी ॥ ज्ञानी० ॥ ४ ॥ ४४ | देख्या मैंने नेमिजी प्यारा ॥ टेक ॥ मूरति ऊपर करों निछावर, तन धन जीवन जोवन सारा || देख्या ० ॥ १ ॥ जाके नखकी शोभा आगें, कोटि काम छवि डारों बारा । कोटि संख्य रवि चन्द छिपत हैं, वपुकी
SR No.010375
Book TitleJainpad Sangraha 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1909
Total Pages253
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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