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________________ जैन दर्शन -मान्य नहीं हो सकता। इस लिये एक कर्मके स्वभावको ही जगत की उत्पत्तिका कारण मानना यह युक्तियुक्त सिद्धान्त है। . . जिस प्रकार क्रियाभावसे कर्तृत्व-कर्त्ताकी सिद्धि करनेवाली आपकी पेश की हुई कल्पनायें असत्य सावित होगई हैं उसी प्रकार आपकी उस तरहकी अन्य कल्पनायें भी असत्य ही सावित होती: हैं । संसारमें ऐसी हजारों वस्तुयें एवं क्रियायें होती हैं कि जिनका कर्ता वुद्धिमान हो ही नहीं सकता। यह बात हम प्रथम एक दफा कह चुके हैं तथापि विशेष समझनेके लिये यहाँ पर फिरसे. उल्लेख करते हैं। गगनमें जो विद्युत-विजली चमकती है वह किस बुद्धिमानकी बनाई हुई है ? निद्रावस्थामें मनुष्य जो क्रियायें करता. है क्या वह उस वक्त बुद्धिमान होता है ? अर्थात् बहुतसी क्रियायें बुद्धिमान कर्ताकेविनाभी संसारमें हुश्रा करती हैं, इसलिये कर्ताको बुद्धिमान साबित करनेकी आपकी एक भी दलील सत्य नहीं ठहरती । विशेष क्या कहें जगत रचयिताको साबित करनेकी आपकी तमाम कल्पनायें रेतकी दीवारके समान हैं। क्योकि आज तक किसी भी मनुष्यने जगत रचनेवालेको कहींपर भी नहीं देखा । आपके समान हम भी इससे उल्टी ही कल्पना कर सकते हैं कि जिस प्रकार कुंभार मट्टी, चाक तथा दंड वगैरह विना घड़ा नहीं बना सकता उसी प्रकार ईश्वर भी उसके पास किसी तरहकी सामग्री न होनेसे जगतकी रचना कर ही नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि जिस तरह आकाश सर्वत्र रहा हुआ है और वह निष्क्रीय है उसी प्रकार ईश्वर भी सर्वत्र रहनेके कारण किसी तरहकी क्रिया कर नहीं सकता। इस तरह किसी प्रकार भी ईश्वर जगतका कर्त्ता साबित हो ही नहीं सकता, फिर उसे नित्य, सर्वज्ञ और एक इत्यादि सब कुछ मानना सर्वथा व्यर्थ है। हम कहते हैं कि यदि ईश्वर नित्य ही हो तो उस एकलेसे ही जगतकी रचना, रक्षा और संहार ये तीनों कार्य किस तरह हो सकते हैं ? एक सदैव एक ही स्वभाववाला होता है वह परस्पर विरोध रखनेवाले कायाँको कदापि नहीं कर सकता। इस लिये . ईश्वरको नित्य मानना यह आपके ही सिद्धान्तसे विरुद्ध होगा। .
SR No.010219
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTilakvijay
PublisherTilakvijay
Publication Year1927
Total Pages251
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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