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________________ जैनशिलालेख संग्रह कम्मरचोडु (बेल्लारी, मैसूर) [इस लेख में पद्मप्रभमलधारिदेवके प्रियशिष्य महावड्डव्यवहारि रायरसेट्टिको पत्नी चन्दव्वे-द्वारा इस जिनमूतिके जीर्णोद्धारका वर्णन है । इस समय यह मूति हिन्दू देवताके रूपमें पूजी जाती है। [रि० सा० ए० १९१५-१६ ० ५६० पृ० ५५] ६२१-६२२ कोरशीवरम् ( अनन्तपुर, आन्ध्र) काद [यह लेख एक स्तम्भपर है। काणूर गणके पुष्पनन्दि मलधारिदेवके शिष्य दावणन्दि आचार्य-धारा एक बसदिके निर्माणका इसमें उल्लेख है। यहींके एक अन्य लेसमें काणूरगणके ()माचार्यको शिष्या इरुगोल राजाकी रानी आलपदेवी-द्वारा इस वसदिकी रक्षाका उल्लेख है।] [रि० सा. ए. १९१६-१७ ०२०-२१ पृ०७२] ६२३-६२६ अमरापुरम् (अनन्तपुर, आन्ध्र) कसद [ यहाँक निसिविलेखोमें निम्न व्यक्तियोंके नाम है-(१) प्रभाचन्द्रदेवके शिष्य कोम्मसेट्टि (२) पोतोज तथा उसका पुत्र सयवि मारय (३) मूलसघ-देसियगणके बालेन्दु मलधारिदेवके शिष्य विस्पय तथा मारय (४) मूलसघ-सेनगणके प्रसिद्ध वादि भावसेन विद्यचक्रवति (५) इगलेश्वरके प्रभाचन्द्र भट्टारकके शिष्य बोम्मिसेट्टियर वाचय्य (६) बैरिसटिक पुत्र सम्बिसेट्टि । यहाँक एक अन्य लेखमें इगलेश्वरके त्रिभुवनकीति राउलके शिष्य देशियगणके बालेन्दु मलधारिदेव-द्वारा एक वसदिके निर्माणका उल्लेख है।] [रि० सा. ए. १९१६-१७ क्र.४१-४७ पृ०७४]
SR No.010009
Book TitleJain Shila Lekh Sangraha Part 4
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyadhar Johrapurkar
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages464
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size10 MB
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