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________________ ५०० चाणक्यसूत्राणि सत्यनिष्ठा कभी भी मनुष्यकी शक्ति से बाहर नहीं होती। मनुष्य सचे भोंमें सत्यनिष्ठ होना चाहे और न होसके ऐसा कभी संभव नहीं है । मनुष्य अपनी प्रत्येक अवस्थामें सत्यपर भारत होने में अनन्त शक्तिमान है । सर्वोपायोंसे असत्यका विरोध करना ही पत्यका व्यावहारिक रूप है। असत्यके प्रति अत्यन्त असहिष्णुता ही सत्यका कठोर स्वभाव है । सत्यनिष्ठ लोग समाजकी शत्रु असत्यकी दाम आसुरी शक्तिका विरोध करनेमें परि. स्थितिके अनुसार जब जो उलटा-सीधा व्यवहार करते हैं वही सत्यनिष्ठा या धर्म होता है। ___ महाभारतमें धर्मके संशोधित रूप पर इस प्रकार विचार किया है धारणाद्धर्म इत्याहुन लोकचरितं चरेत् । सामाजिक जीवनको सुव्यवस्थित रूप देकर धारण करनेवाला ही धर्म है। मनुष्य गतानुगतिक होकर ( स्वार्थी जीवन अपनाकर ) अधर्म न करे। मनुष्य स्वार्थी लोक-चरित्रका अंधा अनुकरण न करे । स्वार्थ समाज. घाती व्याधि होनेसे अधर्म है । मनुष्यको समाजमें शान्ति तथा सुन्यवस्था रखनेवाले तथा मनको कुमार्गसे रोक रखनेवाले भाचरण करने चाहिये । ( पुरुषपरीक्षा ही सर्वज्ञता ) सर्वज्ञता लोकज्ञता ॥ ५४२ ॥ अपनी सुतीक्ष्ण बुद्धिसे लोक-चरित्रको समझ जाना ही ज्ञान या सर्वज्ञता है। विवरण- लोक-चरित्रके विषयमें किसी भ्रान्ति में न रहना सर्वज्ञता है। किसीसे धोका न खाना, किसी अविश्वास्य को विश्वास्य न मानना यही मनुष्य. बुद्धिकी जीवनसे सम्बध रखने वाली सर्वज्ञता है। लोगोंके व्यवहार को सत्यकी कलौटीपर परखने लगना, दुष्टोंके दुष्प्रभावसे बच जाना तथा श्रेष्ठोंके सुप्र. भावसे लाभ उठालेना ही लोक-चरित्रके विषय में ज्ञान पानेकी कुशलता है । सत्यनिष्ठ व्यक्ति स्वयं ही एक कसौटी होता है । वह स्वयं ही लोक
SR No.009900
Book TitleChanakya Sutrani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamavatar Vidyabhaskar
PublisherSwadhyaya Mandal Pardi
Publication Year1946
Total Pages691
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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