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________________ जैन साहित्य संशोधक. [ भाग १ तेम छे. सीलोननी सामेना द्विपकल्पमा रहेता त- जो मौर्यवंशनी उत्पत्ति वीर संवत् २१५ मां थई कालीन जैनो उपर कदाचित् बौद्धोनी असर थई होय तो ते वंशनी एक शाखा वी. सं. २१४ मां होय अने ते वखते तेमणे पोताना प्रतिस्पर्धी पन्थनी राजगृहमा राज्य करती होय ते केम संभवी शके ?. अनुसार पोतानी काळगणनामां फेरफार कर्यो पण जो आरणे हेमचंद्रना कथन अनुसार मौर्यवंश होय. परंतु आ मात्र आनुमानिक विचार छे, अने निर्वाण पछी १५५वर्षे शरु थयो तेम स्वीकारीए तो तेथी वधारे लंबाण करी हुं आनी किंमत घटाडवा तेमा कोई असंभवितता आवती नथी. अने आम इच्छनो नथी. मानवाथी निर्वाणनी निश्चित करेली तारीख पण - हवे आपणे महावीर निर्वाण-समयना विवेचन साची ठरे छे. नीचेनी चर्चा उपरथी पण आपणे उपर पाछा फरी जोईशु के हेमचंद्रनी नोंध अनुसार एज निर्णय उपर आवीए छीए. दरेक स्थविरावलीई. स. पूर्व ४६७ वर्षे महावीर निर्वाण थयुं होय मां वर्णव्या प्रमाणे स्थलभद्रना महागिरि अने सुहते असंभवित नथी. कारण के, ते ( समय ) ई. स. स्ती नामना चे शिष्यो हता. हवे स्थूलभद्र तो पूर्वे ४७७ वर्षवाळा बुद्धना निर्वाण समयी साथे सपळा लेखकोना मते धीरनिर्वाण पछी २१५ वर्षे घणीज सुंदर रीते बंध बेसे छे. अने आ समकालीन- स्वर्गस्थ थया हता. मेरुतुंगना लख्या प्रमाणे महाता होवी आवश्यक छ, एम अमे उपरनी शोधमां गिरि वी. नि. पछी २४५ मां मृत्यु पाम्या हता जणावी गया छीए. अने तेमना पछी सुहस्ती युगप्रधान बन्या हता. ___आ निर्णीत करेला निर्वाण-समयनी महत्ता परं- तेमणे अशोकना पौत्र अन उत्तराधिकारी संप्रतिने परागत निर्वाणसमय करतां केटली बधी वधारे छे ते जैनधर्मनो उपासक बनाव्यो हतो. अशोक चन्द्रजैन इतिहासमांथी मळी आवता बीजा प्रमाणो उपर गुप्तना अभिषेक पछी ९४ वर्षे गुजरी गयो हतो. थी नक्की थाय छे. आवश्यक सूत्र नामना एक पवित्र (बुद्ध निर्वाण पछी १६२ वर्षे चंद्रगुप्तनो अभिषेक. जैन आगमना ' उवग्याय निज्जुत्ती ' नामना प्रक- १६२+९४=२५६ अशोक मृत्यु.) गाथा प्रमाणे रणमा छ निन्हवोनुं वर्णन आवे छे, अने तेज वर्णन संप्रतिनुं राज्य महावीर निर्वाण पछी ३०९ वर्षे संवत् ११७९ ( नवकरहर ) मां रचाएली देवेन्द्रग- (२१५+९४ ) शरु थयु अने हेमचंद्रना कथनानुणिनी उत्तराध्ययनसूत्रनी टीकामां बहु विस्तार-- सार २४९ वर्षे (१५५+९४ ). हवे आपणे पूर्वक पुनः आपवामां आव्युं छे. आ बन्ने ग्रंथोमां गणत्री करीने जोईए छीए तो आमां हेमचंद्रनी जणाव्या प्रमाणे अव्यक्त नामनो बीजो निन्हव वीर- हकिकतज खरी होय तेम जणाय छे. कारण के निर्वाण पछी २१४ मे वर्षे आषाढ नामना आचार्यना संप्रति अने सुहस्ती ( के जे २४५ मां युगप्रधान शिष्योए चलाव्यो हतो. राजगृहना मौर्य राजा बन्या ) बन्ने समकालीन हता. एम उपरनी नोंधथी बलभद्र-जेने आवश्यक सूत्रमा — मुरियबलभद्द ' स्पष्ट जणाय छे. आ नोंध महावीर निर्वाणनी जे अने उत्तराध्ययनमां ' मोरियवंसपसूओ' तरीके तारीख आपणे शोधी काढी छे तेनी सत्यता स्थालखेलो छे-तेणे आ निन्हव मत प्रवर्तकोने पाछा पित करवामां पूर्ण सहायक थाय छे.* सन्मार्गे ( जैनमतमां ) वाळ्या हता. गाथाओ प्रमाणे उपरनी कालगणना संबंधी तपासने हवे समाप्त करी, १ आ टीका शान्त्याचार्यनी टीकामांथी उधृत करवामां जैनोना प्रादुर्भावनो समय नक्की करवामाटे मार्ग पहेलांना आवी छे. मूळ सूत्रनु अर्थबोधन ते कर्तानु पोतानं करेले छे. लेखकोए जे प्रयत्नो कर्या छ तेमना संबंधमां थोडा शब्दो अने तेमा जोवामां आवती घणी कथाओ शब्देशब्द शा. लखवा योग्य धारू छु. आ लेखकोने जैनधर्मनी उत्पत्ति *त्याचार्यनी टीकामांथी उतारेली छे. निश्चित करवामां घणीज अपूर्ण माहीती मळी हती, अन Aho ! Shrutgyanam
SR No.009877
Book TitleJain Sahitya Sanshodhak Khand 01 Ank 01 to 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherJain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna
Publication Year1922
Total Pages274
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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