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________________ [ 46 ] अत्यन्त प्रगल्भ हो गयीं थीं । चिरकाल से अप्रकट विलास भावों को रमणियों ने प्रकट करना प्रारम्भ कर दिया था । मदिरापान के कारण धीरे धीरे लज्जा के दूर होने से किसी नववधू के नेत्र विकसित हो गए थे, उसकी भौंहे खिल उठी थीं और वह नीचे मुख किये हुए ही अपने प्रियतम के मुख को तिरछी नजर से देख रही थी । प्रियतम संकेत-स्थलों पर स्वयं आ गये थे । प्रियतमों के सम्मुख पहुँचकर रमणियों के मुख प्रफुल्लित हो उठे, अंग पुलकित हो गये, हृदय द्रवीभूत हो गये तथा वाणी से क्रोध दूर हो गया । किसी सुन्दरी ने स्तनों को ढंकने वाली चोली को खींच लिए जाने पर लज्जित होकर प्रियतम के दृष्टि-पथ को राकने के व्याज से उसके विशाल वक्षस्थल को ही अपना आवरण बना लिया था । किसी युवक ने प्रेयसी की साड़ी के अंचल खींचते हुए अपने स्तनों को हाथों से ढंकने वाली नववधू का आलिंगन कर लिया । प्रियतम ने जब सन्दरी का आलिंगन किया तो उसके स्पर्श सख से उसका वस्त्र यद्यपि नीचे गिरने लगा था, किन्तु पसीना से लथपथ होने के कारण वस्त्र नीचे गिरने नहीं पाया । किसी नायिका का प्रियतम के समागम के अवसर पर दृढ़ता से बँधा हुआ नीवी-बंधन तुरन्त ही छूट गया । किसी अनुरागी पति ने सुन्दरी की चोर्टी खींच कर उसके अधर का पान करना प्रारम्भ किया । किसी रसिक नायक ने सुन्दरी के ओष्ठ पल्लव को छोड़कर उसके सरस एवं शीतल नेत्रों का ही कुछ समय तक चुम्बन किया । तदनन्तर बाह्यरति करने के पश्चात् आभ्यन्तर सुरत करने की इच्छा करते हुए - नायकों ने प्रथम रमणियों के स्तनों का स्पर्श किया और फिर नाभि-प्रदेश का स्पर्श किया । प्रियतम ने साड़ी की गाँठ खोलने के लिये हाथ बढ़ाया तो रमणी ने उसे पकड़ लिया । रमणियों ने अपने शरीर को यद्यपि संपूर्ण रूप से समर्पित कर दिया था, फिर भी वे रति से प्रतिकूलता दिखा रही थी । और कभी-कभी सुख की अनुभूति में भी ऊपर से दिखाने के लिए वे शुष्क रुदन कर रही थीं। बार-बार गद्गद स्वर में “रहने दो, बस करो" इत्यादि निषेध वाचक शब्दों का प्रयोग करने वाली सुन्दरी के साथ प्रतिकूल व्यवहार करके ही विलासी नायकों ने उनके अनुकूल आचरण किया । इस प्रकार रमणियों के अंगों में सोया हुआ कामदेव, बाहुपीड़न, निर्दय आलिंगन, केशग्रहण, नखक्षत, दनांदशनं आदि व्यापारों से जाग गया । रति क्रीड़ा में तरुणियों के सीत्कार, कण्ठरव, करुण उक्ति, स्नेह भरे वाक्य, निषेध सूचक वाक्य, तथा हँसी और आभूषणों की आवाज - ये सब मानों वात्स्यायन के कामशास्त्र के पदों को सार्थक से कर रहे थे । रति-क्रीड़ा के अनन्तर रमणियाँ लज्जा से अभिभूत हो गयीं । किन्तु प्रथम रति की समाप्ति पर परिश्रम को दूर करने के लिए प्रियतम ने सुन्दरियों का जो निरन्तर आलिंगन किया था, वही अब कामदेव को उत्तेजित करने वाला उनका आलिंगन द्वितीय रतिक्रीड़ा का आरम्भ बन गया । इस प्रकार निरन्तर रतिक्रीडा से रमणियाँ थकगयीं और लज्जावश अपने वस्त्रों को पुन: धारण करने के लिए त्वरा करने लगीं । चन्द्रमा भी लज्जित होकर अधोमुख करके अस्ताचल की ओर मुड़ गया । और रजनी परम निवृत्ति को प्राप्त हो गयी ।
SR No.009569
Book TitleShishupal vadha Mahakavyam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajanan Shastri Musalgavkar
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages231
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size63 MB
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