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________________ ફેર जीवाभिगमसूत्रे पञ्चगतिकाः मनुष्येभ्य उदवृत्य नारकतिर्यङ्मनुष्यदेव सिद्धिरूपासु पञ्चसु गतिषु गमनात् । तथा - चतुर्यो नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवेभ्य उदवृत्य मनुष्येषु आगमनात् पञ्चगतिकाश्चतुरागतिकाः कथ्यन्ते । 'परित्ता संखेज्जा पन्नत्ता' प्रत्येकशरीरिणः संख्याता:- संख्यातकोटि प्रमाणत्वात् प्रज्ञप्ताः - कथिता इति । सम्प्रति गर्भजमनुष्यप्रकरणमुपसंहरन्नाह से तं मणुस्सा' ते उपर्युक्ताः गर्भजमनुष्याः शरीरादि गत्यागतिद्वारैर्निरूपिता इति ||सू० २७|| गर्भजमनुष्यान् निरूप्य देवान् निरूपयितुमाह-- ' से किं तं देवा' इत्यादि । मूलम् —' से किं तं देवा ? देवा चउविहा पन्नता, तं जहा - भवणवासी । वाणमंतरा - जोइसिया । वेमाणिया । से किं तं भवणवासी ? भवणवासी दसविहा पन्नत्ता । तं जहा असुरा जाव थणिया । से तं भवणवासी । से किं तं वाणमंतरा ? वाणमंतरा देवभेदो सव्वो भाणियन्वो जाव ते सामसओ दुविहा पन्नत्ता । तं जहा - पज्जत्ता य अपज्जत्ता य । गतिक और कतिभागतिक होते है । उत्तर में प्रभुन कहा है- "गोयमा ! पंच गइया चउरागइया" ये गर्भज मनुष्य पाचगतियों में जाने वाले होते हैं और चार गतियों से आये हुए होते हैं "पांच गतियों में जाने वाले होते हैं" इसका भाव ऐसा है कि ये नारकतिर्यश्व, मनुष्य देव और सिद्धिगति में जाते हैं । और यहां ये नारकतिर्यश्व, मनुष्य और देव गतिरूप चार गतियो से आकर जन्मलेते हैं इसलिए चतुरागतिक होते हैं । "परित्ता संखेज्जा पन्मत्ता" प्रत्येक शरीरी संख्यात कोटि प्रमाण होने से सख्यात कडेगये हैं । "सेत्तं मणुस्सा" इस प्रकार से शरीरादि से लेकर गत्यागति द्वारों तक कहा गया यह मनुष्यों का प्रकरण समाप्त हुआ | सू० २६ ॥ अछे "गोयमा ! पंच गइया चउरागध्या" आ गर्ल मनुष्य चीय गतियोंभा वा વાળા હાય છે, અને ચાર ગતિયામાંથી આવવાવાળા હાય છે પાંચ ગતિયામાં જવાવાળા હાય છે' એને ભાવ એ છે કે તે નારકગતિ, તિય ચગતિ, મનુષ્યગતિ, દેવગતિ અને સિદ્ધિગતિમાં જાય છે. અને નારક, તિર્યંચ મનુષ્ય અને દેવગતિરૂપ ચાર ગત્તિયામાથી भावीने या गर्भ मनुष्यामन्भ से छे. तेथी खाने अतुराजति खा छे. 'परिता संखेज्जा पन्नता" प्रत्येक शरीरी संख्यात भेटि प्रभावाजा होवाथा सभ्यात उडेला छे. "से प्तं मणुस्सा" मा प्रमाणे शरीरद्वार विगेरे द्वाराशी सहने प्रत्यागतिद्वार सुधी उहेस આ મનુષ્ય સબધી પ્રકરણ સંપૂર્ણ થયું. શાસ્૦ ૨૬૫
SR No.009335
Book TitleJivajivabhigamsutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages690
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size45 MB
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