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________________ " प्रमेयचन्द्रिका टीका श०१० उ०५ सू०१ चमरेन्द्रादीनाम् अग्रमहिषीनिरूपणम् १४७ लोकपालैः, पञ्चभिः अग्रनहिपीभिः सप्तभिः अनीकैः सप्तभिः अनीकाधिपतिभिः चत्वारिंशता आत्मरक्षकदेवसहस्रैः 'अन्नेहिं च बहूर्हि असुरकुमारेहिं देवेडिय सद्धिं संपरिवुडे महयाहय जाव भुंजमाणे विहरित्तए' अन्यैश्च बहुभिः असुरकुमारैः, देवैश्व, देवीभिश्च सार्द्ध' संपरिवृतः - सहितः सन् महता - बृहता, अहत- यावत्नाट्यगीतवादिततन्त्रीतलताल टितघनमृदङ्ग पटुमवादितरवेण -- अहतानि - अच्छि - न्नानि आख्यानकप्रतिबद्धानि वा यानि नाट्यगीतवादितानि तेषां तन्त्रीतलतालानां च शेपत्रुटितानां च घनमृदङ्गस्य च मेघसदृशध्वनिकारक मर्दलस्य, पटुना - निपुणेन पुरुषेण प्रवादितस्य यो रवः - शब्दः स तथा तेन तत्पूर्वकमित्यर्थः दिव्यान् यावत् चार लोकपालों के साथ, पांच अग्रमहिषियों के साथ, सोत अनीकों के साथ, सात अनीकाधिपतियों के साथ ६४ हजार आत्मरक्षक देवों के साथ, तथा 'अन्नेहिं च पहूहिं, असुरकुमारेहिं देवेहि य देवीहिय सद्धि संपरिवुडे महया हम जाव भुंजमाणे विहरित्तए' अन्य अनेक असुरकुमार देवों के साथ और देवियों के साथ घिरा हुआ होकर अर्थात् इनके सब के साथ से युक्त होकर बड़े २ अहत-अच्छिन बीच में भंग नहीं होने वाले अथवा कथाओं के सिलसिले से युक्त हुए ऐसे यावत्-नाटय, गीत संबंधी बाजों के तथा तंत्री तल तालों के तथा और भी त्रुटि के-बाजों के तथा मेघ की जैसी ध्वनिवाले मृदंग के, कि जो पहृत ही वाद्यविद्या में निपुण देव द्वारा बजाया जाता था नादों के साथ २ दिव्य भोग भोगों को भोगने के लिये समर्थ है अर्थात् ६४ हजार सामानिक देवों आदिकों से घिरा हुआ वह चमर बड़े २ मनोहर नाटकों को देखने में एवं सुन्दर जिनमें विविध प्रकार के बाजे ८८ હિષીએની સાથે, સાત અનીકેાની સાથે, સાત અનીકાધિપતિએ સાથે ૬૪ હજાર આત્મરક્ષક દેવાની સાથે, તથા अन्नेहिं च बहूहिं असुरकुमारेहिं देवेहि य देवीहि यखद्धि स परिवुडे महया हय जाव भुजमाणे विहरित्तए " अन्य અનેક અસુરકુમાર દેવે! અને દેવીએની સાથે ( એટલે કે તે બધાંના સ ગથી યુક્ત થઈને) ભવ્ય અને અચ્છિન્ન ( વચ્ચે ભ ગ ન પડે એવાં-કથાઓના ક્રમથી युक्त शेवां) नाटी, गीता, वानित्रा (भेघना नेवा नाहवाजां गृह गो, वीया, કરતાળ આદિ વિવિધ વાજિત્રા) આદિના મધુર નાદો સાંભળી શકે છે. કહેવાનું તાત્પર્ય એ છે કે અસુરેન્દ્ર ચમર પેાતાના ૬૪ હજાર સામાનિક દેવા આદિના સમૂહથી વીંટળાઇને મનેાહર નાટકા દેખે છે, વિવિધ પ્રકારનાં વાદ્યસંગીતની સાથે મધુર ગીતા સાંભળે છે તે દરેક વાદ્ય, વાદ્યવિદ્યામાં નિપુણ દેવા દ્વારા વગાડ
SR No.009319
Book TitleBhagwati Sutra Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages770
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size45 MB
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