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________________ तृतीयः सर्गः २ गुणस्थान योगके निमित्तसे। मोह कर्मको १ उदय, २ उपशम, ३ क्षय और ४ क्षयोपशम ऐसी चार अवस्थाएं संक्षेपमें होती हैं। इन्हींके निमित्तसे जीवके परिणामोंमें तारतम्य उत्पन्न होता है। उदय-आबाधा पूर्ण होनेपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावके अनुसार कर्मों के निषेकोंका अपना फल देने लगना उदय कहलाता है। उपशम-अन्तर्मुहूर्तके लिए कर्म निषेकोंके फल देनेकी शक्तिका अन्तर्हित हो जाना उपशम कहलाता है। जिस प्रकार निर्मली या फिटकिरीके सम्बन्धसे पानीकी कीचड़ नीचे बैठ जाती है और पानी स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार द्रव्यक्षेत्रादिका अनुकूल निमित्त मिलनेपर कर्मके फल देने की शक्ति अन्तर्हित हो जाती है । क्षय-कर्म प्रकृतियोंका समूल नष्ट हो जाना क्षय है, जिस प्रकार मलिन पानी में-से कीचड़के परमाणु बिलकुल दूर हो जानेपर उसमें स्थायी स्वच्छता आ जाती है उसी प्रकार कर्म परमाणुओंके बिलकुल निकल जानेपर आत्मामें स्थायी स्वच्छता उद्भूत हो जाती है। क्षयोपशम-वर्तमान कालमें उदय आनेवाले सर्वघाती स्पर्द्धकोंको उदयाभावी क्षय और उन्हींके आगामी कालमें उदय आनेवाले निषेकोंका सदवस्थारूप उपशम तथा देशघाती प्रकृतिका उदय रहना इसे क्षयोपशम कहते हैं । कर्म प्रकृतियोंकी उदयादि अवस्थाओंमें आत्माके जो भाव होते हैं उन्हें क्रमशः औदयिक, औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक भाव कहते हैं। जिसमें कर्मोंकी उक्त अवस्थाएँ कारण नहीं होतीं उन्हें पारिणामिक भाव कहते हैं । अब गुणस्थानोंके संक्षिप्त स्वरूपका निदर्शन किया जाता है १. मिथ्यादृष्टि-मिथ्यात्व, सम्यङमिथ्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात प्रकृतियोंके उदयसे जिसकी आत्मामें अतत्त्वश्रद्धान उत्पन्न रहता है उसे मिथ्यादृष्टि कहते हैं। इस जीवको न स्व-परका भेद ज्ञान होता है, न जिनप्रणीत तत्त्वका श्रद्धान होता है और न आप्त आगम तथा निग्रन्थ गुरुपर विश्वास ही होता है। २. सासादन सम्यग्दृष्टि-सम्यग्दर्शनके कालमें एक समयसे लेकर छह आवली तकका काल बाकी रहनेपर अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभमें से किसी एकका उदय आ जानेके कारण जो चतुर्थ गुणस्थानसे नीचे आ पड़ता है परन्तु अभी मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें नहीं आ पाया है उसे सासादन गुणस्थान कहते हैं। इसका सम्यग्दर्शन अनन्तानुबन्धीका उदय आ जानेके कारण आसादन अर्थात् विराधनासे सहित हो जाता है। ३. मिश्र-सम्यग्दर्शनके कालमें यदि मिश्र अर्थात् सम्यमिथ्यात्व प्रकृतिका उदय आ जाता है तो यह चतुर्थ गुणस्थानसे गिरकर तीसरे मिश्र गुणस्थानमें आ सकता है। जिस प्रकार मिले हुए दही और गुड़का स्वाद मिश्रित होता है उसी प्रकार इस गुणस्थानवी जीवका परिणाम भी सम्यक्त्व और मिथ्यात्वसे मिश्रित रहता है। अनादि मिथ्यादृष्टि जीव चतुर्थ गुणस्थानसे गिरकर ही तृतीय गुणस्थानमें आता है परन्तु सादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम गुणस्थानसे भी तृतीय गुणस्थानमें पहुँच जाता है। ४. असंयत सम्यग्दृष्टि-अनादि मिथ्यादृष्टि जीवके मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन पाँच प्रकृतियोंके और सादि मिथ्यादृष्टि जीवके मिथ्यात्व, सम्यमिथ्यात्व तथा सम्यक्त्व प्रकृति और अनन्तानबन्धो चतष्क इन सात अथवा पांच प्रकृतियोंके उपशमादि होनेपर जिसकी आत्मामें तत्त्व श्रद्धान तो प्रकट हुआ है परन्तु अप्रत्याख्यानावरणादि कषायोंका उदय रहने में संयम भाव जागृत नहीं हुआ है उसे असंयत सम्यग्दृष्टि कहते हैं। ५. संयतासंयत-अप्रत्याख्यानावरण कषायका क्षयोपशम होनेपर जिसके एकदेश चरित्र प्रकट हो जाता है उसे संयतासंयत कहते हैं। यह त्रस हिंसासे विरत हो जाता है इसलिए संयत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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