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________________ हरिवंशपुराणे संयतासंयतान्तेष गुणस्थानेष पञ्चसु । रूपं प्रत्यमिभेदोऽस्ति यथाध्यात्मक तत्र केवलिनां सौख्यं सयोगानामयोगिनाम् । लब्धक्षायिकलब्धीनामनन्तं नेन्द्रियार्थजम् ॥८ कषायप्रशमोद्भूतं कषायक्षयजं तथा । अपूर्वकरणादीनामुमयेषां परं सुखम् ।।८।। निद्रेन्द्रियकषायारिविकथाप्रणयात्मकैः । प्रमादैरप्रमत्तानां सुखं प्रशमसदसम् ।।८८॥ हिंसानृतपरादत्तग्रहाब्रह्मपरिग्रहात् । निवृत्तानां प्रमत्तानामपि सौख्यं शमात्मकम् ।।८।। हिंसादिभ्यो यथाशक्ति देशतो विरतात्मनाम् । संयतासंयतानां च महातृष्णाजयात् सुखम् ।।९०॥ यद्यप्यविरता तृष्णाहिंसादेपि देशतः। सत्सम्यग्दृष्टयोऽश्नन्ति तरवश्रद्धानजं सुखम् ॥११॥ परस्परविरुद्वात्मसम्यग्मिथ्यादृगङ्गिनाम् । सम्यग्मिथ्यादृशामन्तः सुखदुःखविमिश्रिताः ।९।। सम्यक्त्वं वमतामन्तर्मावः सासादनात्मनाम् । यथा क्षीरघृतोन्मिश्रशर्करोद्गारकारिणाम् ॥१३॥ सप्तप्रकृतिमिश्रेण मोहेन मतिभेदिना । राज्येनेव विमूढस्य मिथ्यादृष्टेः कुतः सुखम् ॥९॥ है। सब निर्ग्रन्थमुद्राके धारक हैं परन्तु आत्माकी विशुद्धताकी अपेक्षासे उनमें भेद है। जैसे-जैसे ऊपर बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे ही उनमें विशुद्धता बढ़ती जाती है ।।८४॥ प्रथमसे लेकर संयतासंयत नामक पाँचवें गुणस्थान तक जिस प्रकार रूप-बाह्यवेषकी अपेक्षा भेद है उसी प्रकार आत्मविशुद्धिको अपेक्षा भी भेद है ॥८५।। इन गुणस्थानोंमें-से सबसे अधिक सुख तो क्षायिक लब्धियोंको प्राप्त करनेवाले सयोगकेवली और अयोग केवलीके होता है। इनका सुख अन्त रहित होता है तथा इन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंसे उत्पन्न नहीं होता ।।८६।। उनके बाद उपशमक अथवा क्षपक दोनों प्रकारके अपूर्वकरणादि जीवोंके, कषायोंके उपशमक अथवा क्षयसे उत्पन्न होनेवाला परम सुख होता है ।।८७।। तदनन्तर उनसे कम एक निद्रा, पाँच इन्द्रियां, चार कषाय, चार विकथा और एक स्नेह इन पन्द्रह प्रमादोंसे रहित अप्रमत्त संयत जीवोंके प्रशम रसरूप सुख होता है ।।८८।। उनके बाद हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापोंसे विरक्त प्रमत्त संयत जीवोंके शान्तिरूप सुख होता है ।।८९।। तदनन्तर हिंसा आदि पांच पापोंसे यथाशक्ति एकदेश निवृत्त होनेवाले संयतासंयत जीवोंके महातष्णापर विजय प्राप्त होने के कारण सूख होता है ।।२०। उनके बाद अविरत सम्यग्दृष्टि जीव यद्यपि हिंसादि पापोंसे एकदेश भी विरत नहीं हैं तथापि तत्त्वश्रद्धानसे उत्पन्न सुखका उपभोग करते ही हैं ।।९१।। उनके पश्चात् परस्पर विरुद्ध सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप परिणामोंको धारण करनेवाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंके अन्तःकरण सुख और दुःख दोनोंसे मिश्रित रहते हैं ।।१२।। सम्यग्दर्शनको उगलनेवाले सासादन सम्यग्दृष्टि जीवोंका अन्तर्भाव उस प्रकारका होता है जिस प्रकारका दूध और घीसे मिश्रित शक्कर खाकर उसकी डकार लेनेवालोंका होता है । भावार्थ-सम्यक्त्वके छूट जानेसे सासादन सम्यग्दृष्टि जीवोंको सुख तो नहीं होता किन्तु सुखका कुछ आभास होता है जिस प्रकार कि दूध, घी, शक्कर आदि खानेवालोंको पीछेसे उसकी डकार द्वारा मधुर रसका आभास मिलता है। उसी प्रकार इनके सुखका आभास जानना चाहिए ॥९३।। तदनन्तर जो स्वप्नके राज्यके समान बुद्धिको भ्रष्ट करनेवाले सप्तप्रकृतिक मोहसे अत्यन्त मूढ़ हो रहा है ऐसे मिथ्यादृष्टि जीवको सुख कहाँ प्राप्त हो सकता है ॥९४॥ विशेषार्थ-मोह और योगके निमित्तसे आत्माके परिणामोंमें जो तारतम्य होता है उसे गुणस्थान कहते हैं। गुणस्थानके निम्न प्रकार १४ भेद हैं-१ मिथ्यादृष्टि, २ सासादन, ३ मिश्र, ४ असंयत सम्यग्दृष्टि, ५ संयतासंयत, ६ प्रमत्तसंयत, ७ अप्रमत्त संयत, ८ अपूर्वकरण, ९ अनिवृत्तिकरण, १० सूक्ष्म साम्पराय, ११ उपशान्त मोह, १२ क्षीण मोह, १३ संयोगकेवली और १४ अयोगकेवली। इनमें से प्रारम्भके १२ गुणस्थान मोहके निमित्तसे होते हैं और अन्तके १. दूरीकुर्वताम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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