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________________ ३२ हरिवंशपुराणे कहलाता है और स्थावर हिंसासे विरत नहीं होता इसलिए असंयत कहलाता है। इसके अप्रत्याख्यानावरण कषायके क्षयोपशम और प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयमें तारतम्य होनेसे दार्शनिक आदि ग्यारह अवान्तर भेद हैं । ६. प्रमत्तसंयत-प्रत्याख्यानावरण कषायका क्षयोपशम और संज्वलनका तीव्र उदय रहनेपर जिसकी आत्मामें प्रमाद सहित संयम प्रकट होता है उसे प्रमत्तसंयत कहते हैं। इस गणस्थानका धारक नग्न मुद्रामें रहता है। यद्यपि यह हिंसादि पापोंका सर्वदेश त्याग कर चुकता है तथापि संज्वलन चतष्कका तीव्र उदय साथमें रहनेसे इसके चार विकथा, चार कषाय, पाँच इन्द्रिय, निद्रा तथा स्नेह इन पन्द्रह प्रमादोंसे इसका आचरण चित्रल-दूषित बना रहता है। ७. अप्रमत्तसंयत-संज्वलनके तीव्र उदयकी अवस्था निकल जानेके कारण जिसकी आत्मासे ऊपर कहा हआ पन्द्रह प्रकारका प्रमाद नष्ट हो जाता है उसे अप्रमत्तसंयत कहते हैं। इसके स्वस्थान और सातिशयकी अपेक्षा दो भेद हैं जो छठे और सातवें गुणस्थानमें ही झूलता रहता है वह स्वस्थान कहलाता है और जो उपरितन गुणस्थानमें चढ़नेके लिए अधःकरणरूप परिणाम कर रहा है वह सातिशय अप्रमत्तसंयत कहलाता है। जिसमें समसमय अथवा भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम सदृश तथा विसदृश दोनों प्रकारके होते हैं उसे अधःकरण कहते हैं ८. अपूर्वकरण-जहाँ प्रत्येक समयमें अपूर्व-अपूर्व-नवीन-नवीन ही परिणाम होते हैं उसे अपूर्वकरण कहते हैं । इसमें सम समयवर्ती जीवोंके परिणाम सदृश तथा विसदृश दोनों प्रकारके होते हैं परन्तु भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम विसदृश ही होते हैं। ९. अनिवृत्तिकरण-जहाँ सम समयवर्ती जीवोंके परिणाम सदृश ही और भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम विसदृश ही होते हैं उसे अनिवृत्तिकरण कहते हैं। ये अपूर्व करणादि परिणाम उत्तरोत्तर विशुद्धताको लिये हुए होते हैं तथा संज्वलन चतुष्कके उदयकी मन्दतामें क्रमसे प्रकट होते हैं। १०. सूक्ष्म साम्पराय-जहाँ केवल संज्वलन लोभका सूक्ष्म उदय रह जाता है उसे सूक्ष्म साम्पराय कहते हैं। अष्टम गुणस्थानसे उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी ये दो श्रेणियां प्रकट होती हैं। जो चारित्र मोहका उपशम करने के लिए प्रयत्नशील हैं वे उपशम श्रेणी में आरूढ़ होते हैं और जो चारित्र मोहका क्षय करनेके लिए प्रयत्नशील हैं वे क्षपक श्रेणीमें आरूढ़ होते हैं। परिणामोंकी स्थितिके अनुसार उपशम या क्षपक श्रेणी में यह जीव स्वयं आरूढ़ हो जाता है, बुद्धिपूर्वक आरूढ़ नहीं होता। क्षपक श्रेणीपर क्षायिक सम्यग्दृष्टि ही आरूढ़ हो सकता है पर उपशम श्रेणीपर औपशमिक और क्षायिक दोनों सम्यग्दृष्टि आरूढ़ हो सकते हैं। यहाँ विशेषता इतनी है कि जो औपशमिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणीपर आरूढ़ होगा वह श्रेणोपर आरूढ़ होनेके पूर्व अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना कर उसे सत्तासे दूर कर द्वितीयौपशमिक सम्यग्दृष्टि हो जायेगा । जो उपशम श्रेणीपर आरूढ़ होता है वह सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थानके अन्त तक चारित्र मोहका उपशम कर चुकता है और क्षपक श्रेणीपर आरूढ़ होता है वह चारित्र मोहका क्षय कर चुकता है। ११. उपशान्तमोह-उपशम श्रेणीवाला जीव दसवें गुणस्थानमें चारित्र मोहका पूर्ण उपशम कर ग्यारहवें उपशान्तमोह गुणस्थानमें आता है। इसका मोह पूर्ण रूपमें शान्त हो चुकता है और शरद् ऋतुके सरोवरके समान इसकी सुन्दरता होती है। अन्तर्मुहूर्त तक इस गुणस्थानमें ठहरनेके बाद यह जीव नियमसे नीचे गिर जाता है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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