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________________ तृतीयः सर्गः प्रक्षयात् पञ्चभेदस्य ज्ञानावरणस्य कर्मणः । दर्शनावरणस्यापि नवभेदस्य भेदनात् ॥६॥ सातासातविकल्पस्य वेदनीयस्य नोदनात् । अष्टाविंशतिभेदस्य मोहनीयस्य हानितः ॥६९॥ चतुर्विधस्य निःशेषप्लोषणादायुषस्तथा । द्विचत्वारिंशतो नाशान्नाम्नो गोत्रद्वयस्य च ॥७॥ पञ्चसंख्यस्य विश्वंसादन्तरायस्य कर्मणः । सिद्धानुपेत्य तिष्ठन्ति सिद्धास्त्रैलोक्यमूर्द्धनि ॥७॥ सम्यक्त्वपरमानन्तकेवलज्ञानदर्शनाः । अनन्तवीर्यतात्यन्तसूक्ष्मत्वगुणलक्षिताः॥७२॥ स्वभावगहनाहीनगुणावगाहनान्विताः । अव्याबाधात्मकानन्तसुखिनोऽगुरुलाघवाः ॥७३॥ प्रसिद्धाष्टगुणाः सिद्धा असंख्येयप्रदेशिनः । वर्णादिविंशतेन शादमूर्त्तात्मतया स्थिताः ॥७॥ ईषदूनसमाकारा वपुषश्चरमस्य ते । मूषापतितसव्योमस्वभावानुविधायिनः ॥७५॥ मृत्युजन्मजरानिष्टसंयोगेष्टवियोगजः । क्षुत्तृष्णाव्याधिजैदुःखैरखिलैरखलीकृताः ॥७६॥ द्रव्यभावमवक्षेत्रकालभेदप्रपञ्चितैः । वियुक्ताः पञ्चमिर्मुक्ताः परिवत्र्तेः सुखात्मकाः ॥७७॥ असंयतचतुःस्थानात् संयतासंयतस्थितेः । नवधा संयतस्थानादसिद्ध स्त्रिविधः स्मृतः ॥८॥ मोहस्योदयतो जीवः क्षयोपशमतद्वयात् । पारिणामिकमावस्थो गुणस्थानेषु वर्तते ॥७९॥ मिथ्यादृष्टियथार्थोऽन्यः सासादन इतीरितः । सम्यग्मिथ्यादृगन्योऽस्ति सम्यग्दृष्टिरसंयतः ॥८॥ संयतासंयतोऽन्वर्थस्तत ऊर्ध्वमुदीरितः । प्रमत्तसंयतस्तस्मादप्रमत्तश्च संयतः ॥८१॥ उपशान्तकषायात् प्रागपूर्वकरणादिषु । क्षपकाः सोपशमकास्त्रिषु स्थानेषु वर्णिताः ॥८२॥ ऊर्ध्व क्षीणकषायोऽस्मात् सयोगः केवली प्रभुः । अयोगकेवलो चेति गुणस्थानक्रमस्थितिः ॥४३॥ नवस्थानेषु निर्ग्रन्थाः रूपभेदविवर्जिताः । अध्यात्म कृतनानात्वादुपर्युपरिशुद्धयः ।।८४॥ स्थित हो गये हैं वे सिद्ध कहलाते हैं ॥६७।। ये पांच प्रकारका ज्ञानावरण, नो प्रकारका दर्शनावरण, साता-असाताके भेदसे दो प्रकारका वेदनीय, अट्ठाईस प्रकारका मोहनीय, चार आयु, बयालीस प्रकारका नाम, दो प्रकारका गोत्र और पांच प्रकारका अन्तराय कर्म नष्ट कर अनन्त पूर्वसिद्धोंमें समाविष्ट हो तीन लोकके अग्रभागपर विराजमान रहते हैं ॥६८-७१॥ सम्यक्त्व, अनन्त केवलज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीय, अत्यन्त सूक्ष्मत्व, स्वाभाविक अवगाहनत्व, अव्याबाध अनन्तसुख और अगुरुलघु इन आठ प्रसिद्ध गुणोंसे सहित हैं, असंख्यात प्रदेशी हैं, पुद्गल सम्बन्धी वर्णादि बीस गुणोंके नष्ट होनेसे अमूर्तिक हैं, अन्तिम शरीरसे किंचित् न्यून आकारके धारक हैं, मोमके साँचेके भीतर स्थित आकाशके समान हैं, जन्म-जरा-मरण, अनिष्ट, संयोग, इष्ट वियोग तथा क्षुधा, तृष्णा, बीमारी आदिसे उत्पन्न समस्त दुःखोंसे रहित हैं तथा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावके भेदसे पांच प्रकारके परिवर्तनोंसे रहित होनेके कारण सुख स्वरूप हैं |७२-७७॥ असिद्ध अर्थात संसारी जीव असंयत, संयतासंयत और संयतके भेदसे तीन प्रकारके माने गये हैं। इनमें-से असंयत अवस्था तो प्रारम्भके चार गुणस्थानोंमें है, संयतासंयत अवस्था पंचम गुणस्थानमें है और संयत अवस्था छठे गुणस्थानसे लेकर चौदहवें गुणस्थान तक नौ गुणस्थानोंमें है ।।७८॥ पारिणामिक भावोंमें स्थित रहनेवाला जीव मोहनीय कर्मके उदय, क्षय, उपशम अथवा क्षयोपशमके निमित्तसे गणस्थानोंमें प्रवृत्त होता है ॥७९॥ गणस्थान चौदह हैं, उनमें से प्रथम गणस्थान मिथ्यादष्टि है जो कि सार्थक नामको धारण करनेवाला है, दूसरा सासादन, तीसरा मिश्र, चौथा असंयत सम्यग्दृष्टि, पांचवां संयतासंयत, छठा प्रमत्त संयत, साँतवां अप्रमत्त संयत, आठवां अपूर्वकरण, नौवाँ अनिवृत्तिकरण, दशवां सूक्ष्मसाम्पराय, ग्यारहवाँ उपशान्त कषाय, बारहवाँ क्षीणमोह, तेरहवां सयोगकेवली और चौदहवां अयोगकेवली है। इनमें से उपशान्त कषायके पूर्ववर्ती अपूर्वकरणादि तीन गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक दोनों प्रकारके होते हैं ।।८०-८३॥ छठेसे लेकर चौदहवें तक नौ गुणस्थानोंमें रहनेवाले मनुष्योंमें बाह्यरूपकी अपेक्षा कोई भेद नहीं For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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