Book Title: Vadodarama Shrimad Vijayanandsurishwarji Maharajna Sanghadana Muni Sammelane Karela Tharavo
Author(s): Jain Yuvak Sangh
Publisher: Jain Yuvak Sangh

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Page 12
________________ ( ४ ) ठराव त्रीजो. आपणा मुनीओए एकल विहारी थवं नहि, अर्थात बे साधुथी ओछा साधुए रहेवुं नहि. कदाच कोई कारण परत्ये एकला रहेवानो प्रसंग आवे तो श्री आचार्य महाराजनी आज्ञापत्रिका मंगावी रहेवा हरकत नथी. ठराव चोथो. कोई साधु जेनी पासे पोते होय त्यांथी नाराज थई आपणा साधु पैकी गमे ते बीजा साथमां भळे तो तेने आचार्यजी महाराजनी परवानगी सिवाय पोताना साथमां मेळववो नहि. ठराव पांचमो. एक खत दिक्षा लई जेणे छोडी दीधी होय तेने आचार्य महाराजनी आज्ञा सिवाय फरी दिक्षा आपबी नहि. संवेग पक्ष सिवायनाने माटे पण ज्यां सुधी बनी शके त्यां सुधी आचार्यजी महाराजनी आज्ञा प्रमाणे चालवुं. ठराव छठ्ठो. साधुओ प्राये मोटा मोटा शहरमा अने तेमां पण गुजरातमांज Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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