Book Title: Samyaktva Mul Bar Vratni Tip
Author(s): Udyotsagar Gani
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 175
________________ ज्ञानातिचार स्वरूपं. १७१, श्रानंद पामे ? अने आश्चर्य पामे? तेम गुरु पुस्तकादिकनी नेट करवा वखतें तेथी पण विशेष आनंद पामे, ते न करे तथा ज्ञानव्य इंजिय सुखमां वापरे, अथवा कोई अव्य खातो होय तेने जाणीने देखीने बति शक्तियें उवेखे नहीं तथा बति शक्तियें शिक्षा न आपे, को उपर उग्रता करें नहीं; मनमां एवं जाणे के आपणने शुंडे ? जे जेवू करशे, ते तेवू पामशे. एवी रीतें गश् गुजरी करी जाय. तथा ज्ञानी पुरुष उपर वेष राखे, ज्ञानीनो अवर्णवाद बोले, झान नणनारने अंतराय करे, बति शक्तिएं ज्ञानने जणवा,गणवा, तथा सांजलवावालानी सहायता करे नहीं. ज्ञाननागंजीरनावमां असदहणा करे, शास्त्रोना अटपटा अदरनी मजाक करे, इसे, कुयुक्ति लगाडे, गुरु तथा सिद्धांतनी प्रत्यनीकता करे, अने मतिज्ञानादि पांच छाननी असदहणा करे, इत्यादि अतिचार लगावे, ते त्रीजो अबहुमानातिचार. ४ चोथो उपधानहीनातिचार. ते श्रावक, उपधान वह्या वि ना षडावश्यकादि क्रिया करे, तथा साधु, योगनी तपक्रिया कीधा विना सिद्धांत जणे, जणावे, तथा संचलावे, त्यारें तेने चोथो उपधानहीनातिचार लागे. ____५ पांचमो गुरुनिन्हवण अतिचार.ते कोअल्पश्रुत, अल्पवि ख्यात एवा साधु अथवा श्रावकनी पासें नण्यो होय, मूल उपकार तो तेनो होय, पनी नणवावालो पोताना सारा क्षयोपशम उद्यम श्री शास्त्रमा घणो हुशीआर, शाणो अने चतुर थयो; त्यारे को इनक लोको, तेनी निपुणता, अने चमत्कारिक ज्ञान जोश्ने ते चमत्कार पामी बहुमान करी पूजे के, अहो खामिजी ! तमे श्रुतमां सावधान बो, एवी श्रुतज्ञाननी चतुराश्, संपूर्ण विद्या, ति के बासें जण्या बो ? जो ते गुरु हाल अहीं विद्यमान त तथा श्राशोअमे पण दर्शन करियें. हवे ते गुरु तो सुधो असताश तथा बर गाउम

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