Book Title: Sadhu Sadhvi Yogya Pratikraman Kriya Sutro
Author(s): Sirsala Jain Pathshala, 
Publisher: Sirsala Jain Pathshala

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Page 14
________________ साधु अर्थः | विना शरीरने प्रसारवाथी, तथा (बप्पिय संघट्टणकी के ) पगोवाळा मांकम, जुआदिकनु नपमईन यवाथी जे कोइ अप्रति तिचार मने लाग्यो होय, ते हुं पमिकमुं छु. * बाकीनो अर्थ स्पष्ट ले. * ॥५॥ श्री श्रमणसूत्र ॥ ॥ नमो अरिहंताणं ( एक अथवा त्रण ) ॥ करेमिन्नते सामा० (एक अथवा त्रण)॥ ॥ चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं ॥ अर्थः-(चतारि के०) चत्वारः एटले चार ( मंगलं के0 ) मंगलरूपडे ते चार क्या क्या ने तो के (अरिहंता के)|| अरहंतप्रभुन ( मंगलं के) मंगलरूप ले. वळी (सिक्षा के०) सिझमहाराजो ( मंगलं के) मंगल रूप ले. वळी (साहू के) साधुमुनिराजो ( मंगलं के0) मंगलरूप ले. वळी ( केवलिपन्नत्तो के0 ) केवलिप्रइत्पः ऐटले केवलिमकाराज कहेलो (धम्मो के ) धर्मः ऐटले धर्म ने ते, ( मंगलं के० ) मंगल रूप ले.॥॥ ॥ चत्तारि सरणं पवजामि । अरिहंते सरणं पवजामि । सिहे सरणं पवजामि । साढूसरणं पव जामि । केवलिपन्न धम्म सरणं पवजामि ॥२॥ अर्थः-(चत्तारि के०) चतुरः, एटले चारने (सरणं के) शरणे ( पवजामि के ) प्रव्रजामि, एटले हुं जानं छु. कोने कोने शरणे जावं ? तो के, ( अरिहंते के0 ) अरिहंतप्रभुने ( सरणंपवजामि के ) दुं शरणे जानं छु. वळी (सिज्ञ के ) सिह महाराजोने (सरण पवजामि के० ) हुं शरणे जाळं छ. वळी ( साहू के ) साधु महाराजोने ( सरणं पवज्जामि के ) हुं शरणे जालं छ. वळी (केवलिपन्नत्तं के0) केवलि महाराजे प्ररूपेला ( धम्मं के० ) धर्म प्रते ( सरणं पवजामि के०) हुं शरणे जानं छै ॥२॥ ॥ चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिश लोगुत्तमा, साढू लोगुत्तमा, केवलि पन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो॥ अर्थः-( चत्तारि के0 ) चत्वारः एटले चार ( लोगुत्तमा के0 ) लोकोत्तमाः एटले आ लोकमां नत्तम बे; ते चार क्या Jain Educanterational For Personal & Private Use Only www.janelibrary.org

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